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Showing posts from September, 2016

36 गामा में बस्ता

"36 गामा में बस्ता तू एक शहर बनाई है "

36 गामा में बस्ता तू  एक शहर बनाई है  के कहने ऊपर वाले के  जमा कहर बनाई है 

देख के जिसने घी सा घल्जा बुझा हुया लट्टू भी जलजा खेतों खेत ने जाती तू एक नहर बनाई है
रात अँधेरी पाछे  चढ़ती सुबह सी आई है 

तेरे करके बालक पढते ना  घर आल्या ते भी डरते ना मर जाणी तेरे पीछे इनकी रोज लड़ाई है 
लागे कईया ने मरेगी  इसी आफत आई है

तेरे पीछे कोई बुलेट कढवारा  नए लत्ते कोई घाल के आरा  भरी दुप्हेरी सीखे इंगलिश  सुबहे शाम ने जिम में जारा 
बैरण और बता तू क्योंकर चाहवेगी  इब के देसी बालका धोरे डांस करावेगी

सरकार कित्ते तन्ने बैन करा दे  रूप तेरे पे टैक्स लगा दे  गाँम सारे में रुक्का पड़जया  भरे शहर दंगे करवा दे 
पहर गुलाबी सूट जद म्हारी ते जावेगी  लागे जिगरी यारा में ही लट्ठ बजवावेगी. 

‘दीप’ तो झूठ बताता ना  हर एक ते आँख मिलाता ना पर तन्ने देख के लागे ज्यु  लांखा में एक बनाई है 
बोले मीठी दीखे सुथरी  दिल की नेक बनाई है प्रदीप सोनी 

बोल दे आखिरी दिन है

थकान भरा दिन खत्म होने की कगार पर था. दिमाग एक दम पक कर गाजर पाक हो गया. कॉलेज से निकलने की तैयारी चल रही थी इंतजार था कब बड़ी सुई 12 पर आये और कब मैं भागू. तभी मेरा दोस्त आया उसके साथ एक लड़की भी थी. दिखने मैं एकदम गुम सुम सी. दोस्त ने इंट्रोडक्शन कराते हुए बताया. ये "नेहा" महाराजा अग्रसेन कॉलेज से है. अगले तीन दिन तक इनका जोइंट सेमिनार है अपने कॉलेज में तो अगले तीन दिन इनसे कोरडीनेट करना है मुझे. अब अपना तो दिमाग वैसे ही डिप्रेसन मोड में था. "बढ़िया है भाई कर कोरडीनेट तू भी क्या याद रखेगा" ये कहते हुए मैंने नेहा को हलके लिहाज से "हाय" कहा और निकल लिया.
अगले दिन कॉलेज पंहुचा तो भाई हमारे कॉलेज में एक गली हुआ करती " गली मतलब लोब्बी अरे वो यार जिसपे फिसलने वाली टाईल्स लगी होती है" तो में उधर से जा रहा था तभी सामने देखा तो नेहा भी आ रही थी. पता तो था आमने सामने है फिर भी वो जमीन देखते हुए निकल गयी और मैं पेड देखते हुए निकल लिया. फिर एक दो बार ऐसे ही आमना सामना हुए और इस तरह दो दिन खत्म हो गए.
तो भाई अब शाम को घर बैठा मैं कुछ नहीं कर रहा था. तो एक दम से…

बदल जाते है

बदल जाते है (PDF)

निकल जाये जब मतलब अपना लोगो के अकसर ख़्यालात बदल भी जाते है
दौड़ते है हौसले जब हाथों की रगों में लकीरे, किस्मत और औकात बदल भी जाती है
बदलने पड़ते है राह, राही, राहगीर भी मुश्किलों में मक़सद, मंजिल,भगवान बदल भी जाते है

जाते नहीं कुछ लोग भुलाये चाहे दिन, महीने चाहे साल बदलते जाते है
बदलते नहीं 'दीप' जो खास हुआ करते है   वरना साथ समय के मौसम, अपने और सरकार  बदलभी जाती है  
प्रदीप सोनी 

इतवार का क्रिकेट मैच

सुबह के 6:00 बज चुके थे और आँख खुली तो पता लगा अरे आज तो रविवार है. और मुझे क्रिकेट खेलने भी जाना है. वैसे सन्डे के दिन ग्राउंड में बड़ी रंगीनिया रहती है चिड़िया – तितली - बुलबुल की मौजूदगी से लौंडो में काफी उत्साह रहता है और वे खेल भावना से आगे बढ़ कर हवाबाजी में भी अपना 100% देने की कोशिश करते है.
कोई मुहँ धोकर तो कोई बिना धोए धीरे धीरे लगभग सब लोग खेलने आ गए और टीम बाट के मैच शुरू हो गया. पर आज कोई लापता नज़र आ रहाँ था. मतलब आ रही थी. लगता है आई ही नहीं होगी.

वैसे मैंने अपने खेल कौशल के बारे में तो बताया ही नहीं. स्वाभाव से आशिकाना और बल्लेबाजी में गंभीरता मेरी काबिलियत है. मोहोल्ले के सबसे घातक बल्लेबाजो में गिनती होती है और छक्को से दुश्मनी ऐसी की जब भी बैट हाथ में लू तो तीन चार को तो मार के ही आऊ. आखिरी बोल पे सिंगल लेना मेरे उसूलों के खिलाफ है.
अब मोहोल्ले के प्लयेर तो सभी जानते ही है जो 2 - 4 बोल खाली निकल दे. बस वो ही हमारी जान को ब्रेट ली हो जाए. तो भाई जैसे तैसे गेम शुरू हुआ और हमारी फिल्डिंग आई और दूसरी टीम 6 ओवर में 40 रन बना गयी.
इस दिन की खास बात ये थी की एक छोटा बच्चा मेरे साइ…

ना कोई क़यामत आईं है

" ना कोई क़यामत आईं है "
इस हस्ते बस्ते शहर में कैसे गुमनामी छाई है सब उजड़ा उजड़ा लगता है क्या कहर सुनामी आयी है
बह गए दिलो के अरमा सारे सब किस्मत की रुसवाई है है अपने हाथो शहर ये उजड़ा ना कोई क़यामत आईं है
सालों बाद मिले है किस्मत इन अंजनी राहो में कहने वाला हुआ है क्या कुछ बीते हुए जमानों में
गुजरा वक़्त है गुज़रे रिश्ते गुजरे यार पुराने है धीरे धीरे गुजर गया सब अब तो सब अफ़साने है

भर्ती

तीसरे सेमेस्टर के पेपर चल रहे थे और मैं हमेशा की तरह टाइम से 2 घंटे पहले पहुंच चूका था. क्योकि ये टाइम मेरी तैयारी का 90% हिस्सा होता था. पेपर शुरू होने में करीब करीब 5 मिनट थी पर मेरा एक खास दोस्त अभी तक लापता था. चलो कोई ना 'आता होगा' ये सोच कर मैं सिटींग प्लान देखके क्लास की तरफ खिसक लिया. अब पेपर शुरू हुए 10 मिनट हो चुकी थी लेकिन उसकी सीट अभी तक खाली थी. अब मैं थोड़ा सा टैंशनते हुए कोने पर पड़े मेरे बैग मेंसे फ़ोन निकलते हुए बाथरूम की तरफ निकल पड़ा. वहाँ जाते ही फ़ोन घुमाया

मैं : हैल्लो आशीष
आशीष : हा भाई
मैं : कहा है भाई
आशीष: भाई गाव में आर्मी की भर्ती चल रही है वो ही देखने आ रख हुँ
मैं : अच्छा रे आज तो पेपर था
आशीष: कोई न भाई पेपर तो अगली बार दे दूँगा। अगर सिलेक्ट हो गया तो क्या पता पेपर देना ही न पड़े
मैं : अच्छा भाई फिर ढंग से फाड़ दियो भर्ती वैसे भी पेपर तो तुझे दुबारा देना ही पड़ता ( हँसते हुए ).
आशीष: हां ठीक कह रहा है भाई ( हँसते हुए )
मैं : राम राम
आशीष: राम राम भाई

जो दौर गवाँए बैठे है

जो दौर गवाँए बैठे है PDF



थे शौक नये अरमान बहुत बसते थे दिल में ख्वाब बहुत बचपन वाले दिनों का वो इतवार भुलाए बैठे है
आया फिर से याद वही जो दौर गवाँए बैठे है
कभी कच्चे पक्के रास्तो में कभी रेल बसों के धक्को में चार जून की  रोटी खातिर दिन रात भुलाए बैठे है
आया फिर से याद वही जो दौर गवाँए बैठे है
इस बसते शहर बेगाने में इन चेहरे सब अनजाने में वो होली और दिवाली के त्यौहार भुलाए बैठे है
आया फिर से याद वही जो दौर गवाँए बैठे है
ना गुजरा वक़्त भी मुड़ता है ना टुटा दिल भी जुड़ता है दिए दुनिया के ज़ख्मो पर मरहम वक़्त की लगाये बैठे है
आया फिर से याद वही

सर्दी का पेपर

बात तकरीबन 2 साल पहले की है समेस्टर के पेपर चल रहे थे. भयंकर सर्दी की सुबह थी और मैं नाह-धो के कॉलेज जा रहा था. अब जान लेवा सर्दी मैं नहाने का दर्द तो आप समझ ही सकते है. खैर जो भी है नहने के बाद दिमाग तो थोड़ा चलता ही है. जेब मैं पेन और रोल नंबर जेब ठूस के और हाथो मैं सैंपल पेपर लिए 40 नंबर के जुगाड़ मे निकल पड़े थे कॉलेज की तरफ. हर बार की तरह टेम्पो वही खड़ा था. भयंकर सर्दी घना कोहरा के बीच बिना देर किये मैं टेम्पो मैं बैठ गया.
सैंपल पेपर खोल के गहन अध्ययन शुरू कर दिया आखिर 40नंबर की बात है. टेम्पो हिलने लगा. पता लगा टेम्पो वाले भाई ने मोटर मैं रस्सी डाल के खींच दी इसी के साथ चारो तरफ धुक- धुक का शोर शुरू हो गया. और मेरा ध्यान बिना हिले किताब में गड़ा रहा. पूरे 100 मीटर ही चला होगा टेम्पो इतने मे भाई ने गाना बजा दिया " इस जहाँ की नहीं है तुम्हारी आंखे आसमा से ये किसने उतारी आँखे " बस हो गयी आज की पढाई ये सोचते हुए मैंने सैंपल पेपर बंद कर दिया। और देखा की आस पास क्या चल रहा है. जैसे ही मेरी नजर एकदम सामने गयी. तो एक खूबसूरत कन्या नीली आँखों वाली बैठी हुई थी. पूरा मुंह अलकायदा के आ…

About Author

नाम प्रदीप सोनी और घर वाले प्यार से ‘गोलू’ बुलाते है. यार दोस्तों ‘सोनी–मोनी–टोनी’ या जो नाम हत्थे चढ़ जाये वही. हरियाणा के शहर रेवाड़ी में अपना घर पाया जाता है. परिवार में 4 लोग है. फादर साहब का अपना बिज़नस है. माता जी गृह मंत्रालय संभालती है. और छोटा भाई अभी कॉलेज जाता है. जिंदगी की सबसे जबरदस्त बात ये रही की भगवान ने एक नंबर के माँ–बाप दिए जिनका आशीर्वाद, प्यार  और भरोसा हमेशा मिलता रहा है. बाकी रही बात भाई की तो भाई तो क्या है दोस्त है अपना एक नंबर का लड़का है. 

अपने नाना जी और मामा जी ने काफी ऐसे अनुभव उपलब्ध कराये जो शायद कभी खुद के दम पर करना आसान नहीं होता. अब चाहे वो तीन सितारा होटल का खाना हो या फिर सीमा से सटे पठानकोट के आलिशान होटल से सर्द सुबह को भारतीय वायुसेना के विमान को हिमालय की पहाड़ियों में लुप्त होता देखना. इसकी चर्चा भी की जायगी ब्लॉग में.

अब आप सब सोच रहे होंगे की आखिर मैं चाहता क्या हूँ “ तो सोचते रहो मुझे क्या “ चलो बता देत है भाई. बात ये है की बचपन से शर्मीला होने के कारण काफी ऐसी चीज़े रही जो मैं करना चाहता था पर शर्म की वजह से कभी की नहीं जैसे स्कूल में होने वाले …