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केंद्रीय विद्यालय - रोहिणी


कुछ जगह या चीज़े ऐसी होती है जिनसे इंसान का दिल से लगाव होता है. जैसे अपने लिए  केंद्रीय विद्यालय है. क्यों की भईया अपनी तो स्कूलिंग केंद्रीय विद्यालय की ही है तो मैं तो कहूँगा ही. कुछ दिनों पहले केंद्रीय विद्यालय रोहिणी में जाना हुआ. जाना तो क्या हुआ था पेशी हुई थी क्योकि मामा को  टीचर ने प्रेम पत्र भेजा था की आपका बच्चा कुछ ज्यादा ही होनहार है और आप आकर एक बार मिल ले. अब अपन भी मामू के साथ खिसक लिए स्कूल के लिए. तब प्रिंसिपल सर के साथ मामा की पेशी शुरू हुई तब मैं बाहर आकर गैलरी में बैठ गया. तो भाई वहाँ गैलरी में देखो तो वो ही स्काउट गाइड के पेडल पावेल की फोटो, बच्चो की कलाकारियाँ, ज्ञान भरी बाते, और प्राथना से सारी गैलरी भरी हुई थी. सब कुछ वैसा ही था जैसे अपने ज़माने में होता था. बस सफ़ेद शर्ट और ब्लू पेंट हुई करती थी अब तो सारा मामला रंग बिरंगा हो चूका है. तब मुझे कुछ चुल्ल हुई तो अपना फोन निकाल लिया और सर नीचे करके फेसबुक चलाने लग गया.

तभी एक छोटू आया और बोला “ भईया टेम्पल रन खिलाओ ना  “

मैंने कहा “ नहीं है यार ले अस्फाल्ट खेल ले “

फिर उसने 2 मिनट तक कोशिश किया और हाथ हवा में ही घुमाए जाये और घुमाए जाये . कभी यहाँ कभी वहाँ तभी मुझे लगा की मेरा फोन संकट में है. पर उसने वापिस दे दिया ये कहते हुए “ इससे अच्छा तो कैंडी क्रूश है “
अपने तो समझ ना आया की ये बच्चा जिंदगी से आखिर क्या चाह रहा है. फिर मैंने सोचा की इसके साथ एक फोटू तो ले ही लू . तभी एक दम से बोहत सारी घंटियाँ बजने लग गयी. एक बार तो लगा कही अंडाटेकर ना आ गया हो.



फिर सारे बच्चे एक साथ अपनी अपनी क्लास से भागते भागते बाहर निकलने लगे. मैं तो ये सीन देख की इतना खुश हुआ इतना खुश हुआ मतलब बहोत खुश हुआ. बिलकुल उतनी ही खुशी थी सब के चहेरे पे जिनती अपन लोग हुआ करते थे. कसम से ये सीन तो बिल्कुल स्कूल के दौर में ले गया. फिर वो ही भाती भाती के बच्चे अपना अपना लंच बॉक्स लेके गैलरी में बैठ कर खाने लगे.  सब मिल बाट के खां रहे थे एकदम नेतओं की तरह. पर एक बच्चा ऐसा भी था जो अकेला खा रहा था. मैंने पूछा “ अरे छोटू भाई तू भी इनके साथ खा ले “ उसने बड़े खौफ से कहा “ मम्मी ने मना किया है ना किसी को खाना देना ना किसी का खाना खाना “ तब लगा की आंटी केजरीवाल की फैन होंगी. चलो जो भी है. तब मैंने उन बच्चों की फोटो ले ली खाना खाते हुए.


बस फिर क्या था सब ने एक साथ मेरे ऊपर हमला कर दिया “भईया हमारी - भईया हमारी “ पर असल में मुझे मजे आ रहे थे. तब एक नटखट सा बच्चा आया और बोला “ भईया एक चीज़ दिखाऊ “ और मेरा हाथ पकड़ के खम्बे के पास ले गया. तब खम्बा देख के मैंने कहा “ अच्छा है इसकी भी फोटू लू क्या ?? “ फिर वो बोला नहीं देखो. और एक दम से खम्बे पे चढ गया और तरह तरह के करतब करने लगा गया. वैसे मस्त मस्त स्टंट दिखा रहा था छोटू. तब बहोत सारी फोटो लेनी पड़ी क्योकि भाई ये बच्चे तो मानते ही नहीं. तब ‘बालू’ भी दिखाई दिया बालू अपना  छोटा भाई है वो का कहत रहे अंग्रेजी मा कसन ब्रदर  “ मैंने कहा “ ओए बुलबुल आज तो गया बेटा तू घर चल “ वो मुंह फूला के चला गया. और संकट ये हुआ की उसके क्लास वाले बच्चों ने सुन लिया फिर क्या था पुरे स्कूल से आवाजे आने लगी “ कार्तिक – बुलबुल,  कार्तिक – बुलबुल  ) बिचारा रोने को हो गया. इतने में फिर से काफी सारी घंटिया बजी और सारे बच्चे फिर से क्लास में जाने लग गए. और सारे जाते टाइम “ बाय - भईया “ बोल के गए “भाई को” और कुछ तो हाथ भी मिलाके गए. कसम से सुपरस्टार वाली फीलिंग आ रही थी. और फिर मामा और प्रिंसिपल सर बाहर आये और उन्होंने मामा को  सी - ऑफ किया.

तब मैंने हलकी आवाज़ में पूछा “ क्या कंहा सर ने “
मामा : “ यार ये पढता नहीं है  “
मैं : अच्छा “अरे कुछ नहीं पढ़ लेगा मामू “

फिर हम चल दिए घर की तरफ और मैं तो कसम से बहोत खुश था यार  मजे आ गए  सब वैसा ही था जैसा हमारे ज़माने में हुआ करता था.


" और अपनी तो ये सलाह है की भईया  मौका निकाल के स्कूल जाते रहना चाहिए काफी अच्छा लगता है. "

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A PHOTOGRAPHIC VISIT TO HARYANVI CULTURE

शहीद

शहीद PDF 



वो रोज धमाके सुनते है
जीते हैं जंग के साये में
वो खडे हुए हैं सीमा पर
ले असला अपनी बाहों में

गोलियों की बरसात में
वो लाल लहू से नहाते हैं
होली हो या दिवाली हो
सब सीमा पर ही मनाते हैं

इक आस जो घर पर जाने की
जो पल भर में धुल जाती है
सीमा पार से आकर गोली
साथी को डंस जाती है

फिर कहते हैं इस हालत में
हम घर को जा सकते नहीं
सर कटा सकते हैं लेकिन
सर झुका सकते नहीं
फिर खून खौल सा जाता है
रह रह कर गुस्सा आता है
वो घुंट लहू का पीते हैं
मर मर कर फिर भी जीते हैं

इस वतन चमन के खातिर
अपनी जान देश पर वार गए
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सीधे स्वर्ग सीधार गए

सजा तिरंगे में अर्थी‎ जब
घर पर लाई जाती है
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शहादत गिनाई जाती है
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बस इतनी सी ये कहानी है
ना इनका कोई बुढ़ापा है

सलाम ना आया

सलाम ना आया (PDF)




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