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Life @ MRK


इस पोस्ट का मकसद किसी भी तरह से कॉलेज की प्रशंसा या बुराई करना नहीं है. ये पूर्ण रूप से व्यक्तिगत विचार है अगर ये विचार किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु के विचारों से मेल खाते है तो उसे महज संयोग और मेरा दोस्त कहा जायगा.

रियाणा के दक्षिण में बसे शहर रेवाड़ी से 7 किलोमीटर दूर खेतो के बीचो बीच उगे इस कॉलेज को “ MATA RAJ KAUR INSTITUTE OF ENGINEERING & TECHNOLOGY “ नाम से जाना जाता है. बनावट के हिसाब से ठीक ठाक ज़बरदस्त, स्टाफ के हिसाब से भी कुल मिला के बढ़िया. सुविधाओं के लिहाज से अच्छा कहा जा सकता है. खेतो के बीच में बसे होने के कारण लडको को कॉलेज से फरार होकर पिक्चर देखने जाने में काफी परेशानी उठानी पड़ती है. कभी कभी तो कॉलेज से भागे लड़के ऑटो ना मिलने की वजह से वापिस कॉलेज ही आ जाते है. कॉलेज की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा हरयाणा के बहार के लौंडो का भी होता है. जो थोड़े दिन में हरयाणवी बोलते देखे जा सकते है.  अब काफी लोगों के मन में सवाल आया होगा की लड़कियाँ कैसी है भाई तो अपना जवाब है जैसा देखने वाला देखे. बाकि अपन को तो कोई खास लगी नहीं.

                                       

अब सब सोच रहे होंगे के ये सब क्यों बताया जा रहा है तो लिजीये पेश करते है सारा किस्सा. जब 12 वे के बाद लौंडे ने दीन दुनिया में पूछा की अंकल अब क्या करना चाहिये तब लोगों ने बहका दिया गया “ बेटा B.Tech कर ले बहुत स्कोप है ”. और इसी के साथ लड़के अपनी ज्ञान से परे की चीज़ में हाथ डाल बैठे. और इंजिनियर बनने के सपने लिए B.Tech में दाखिला ले लिया जब पूछा जाता की कौन सी ट्रेड लेनी है तो 90 % लडको को तो पाता ही नहीं होता आखिर करना क्या है. और कुछ लौंडे तो जाकर एक ही बात कहते “ सर, जिसमे लड़कियाँ ज्यादा हो उसी में नाम लिख दो “  इस तरह B.Tech का एक बैच तैयार होता.

 

हसीना चौक से हर लड़के के जज्बात काफी हद तक जुड़े हुए है. ये कॉलेज का ऐसा लैंडमार्क है जंहा अक्सर लौंडे लोग खाली पीरियड में या क्लास बंक करके लड़किया दर्शन के लिए इक्कठे होते है. ये चौक भूगोल की स्तिथि के हिसाब से दो गलियों को इस तरह जोड़ता है. जिससे वहा बैठने वाले लौंडो को 270* से ज्यादा का कोण मिलता है और हर और से आने वाली तितलियों के दर्शन सुगम तरीके से हो जाते है.




झंडा चौक को प्रैक्टिकल फाइल बनाने या एग्जाम टाइम पर बैठ कर किताब देखने के स्थान के रूप में जाना जाता है. जहा सर्दियों में धुप सेकते हुए लौंडे लोगो ने काफी प्रैक्टिकल फाइल बनाई है. मास बंक होने पर फैकल्टी द्वारा झंडा चौक पर रेड करना आम बात है. जंहा अपने लड़के वोल्ली - बाल खेलते रंगे हाथ पकडे जाते. फिर उन्हें बड़ी बेरहमी से क्लास में ले जाकर पढ़ाया जाता था.

इसी बात पर एक वाकया याद आया

हमारा वोल्ली बाल का मैच चल रहा था और हमारी क्लास हार रही थी तो सब बौखलाए हुए थे. तो घटना ये हुई की सचिन के पास जो भी बोल आती वो हमेशा बहार मार देता. जो बोल आये बहार तब भाई तरुण को गुस्सा आया और उसने बड़े ही प्यार से कहा

“ याल मैं इस्ते कुछ कह दूगा इसकी शादी वैसे हो राखी है “

और सारे लौंडे जोर जोर से हंस पड़े

 

कैंटीन कॉलेज मैन बिल्डिंग से थोड़ी सी दूरी पर बसी हुई है दिखने में सिम्पल एंड सोभर और माल पानी में एक दम गोबर. यहाँ आपको वो नहीं मिलता जो आप चाहते हो बल्कि वो लेना पड़ता है जो उनके पास होता है. चलो जैसी भी है पर लौंडो की भी बड़ी यादे जुडी है उससे. कैसे 20 -20 रुपे मिला के चाय - समोसे का जुगाड किया जाता था. कॉलेज की तंगहाली में बीस रुपे खर्च करना भी एक बड़ा फैसला होता था जिससे लडको के अर्थव्यवस्था पर काफी असर पड़ता था.



कॉलेज में अपना तो सबसे स्वाद टाइम तब आया जब कॉलेज ने फेस्ट का आयोजन किया. डांस के रिहर्सल करते हुए लडकियों को छुप छुप के ताड़ने का मजा ही कुछ और था . हाँ फेस्ट के टाइम मुझे शौक हुआ की इस बार भाई डिबेट करेगा. नाम वाम सब लिखवा दिया और प्रैक्टिस भी शुरू कर दी. पर जब डिबेट शुरू हुई तो सबसे पहले नंबर ही मेरा. स्टेज पे जाते ही अपन तो भूल भाल गए सब मैं 100 लोगों के सामने खड़ा होकर ये देख रहा था की यहाँ मुझे छोड़ कौन गया यंहा और ये सब लोग चाहते क्या है. फिर 2 - 3 लाइने बोलकर और बेईज्ज़ती कराकर में तो खिसक लिया वंहा से. उन दिनों में तो भाई लौंडे लोगो के साथ मिल कर खूब बच्क्चोदी की और स्वाद लिए. तब क्या घटना हुई अपुन बैठा हुए लडकियों का डांस देख रहा था तभी बोहोत से लोग एक लाइन में स्टाइल से चलकर आ गए. तब मैंने मैडम को पूछा “ मैडम ये क्या चाह रहे है “ तब मैडम ने जवाब दिया “ ये रैंप वाक वाले है तू भी चल खड़ा होकर लग जा लाइन में “ अब रैंप वाक का नाम सुनते ही अपने दिमाग में तो घूम गया सारा “ फैशन टीवी “ मैंने कहा “ मैं नहीं मैडम मेरी मम्मी मारेगी “ फिर जबरदस्ती मुझे झोक दिया गया अब माना की लड़के की पेर्सोनालिटी सुपरस्टार जैसी है फिर भी संस्कार नाम की कोई चीज़ होती है चलो जो भी है. फिर ऐसे ही दिन निकलते रहे. तो भाई जिस दिन रैंप वाक की ड्रेस मिली उस दिन मुझे मदारियों वाली ड्रेस दे दी कह रहे थे गुजरती ड्रेस है . तभी मैंने सोच लिया मैं नहीं पहन ने वाला ये तमाशा तभी मेरी नज़र तमिल नाडू वाली ड्रेस में खड़े लुंगी वाले भाई पर पड़ी तब जाकर तस्सली मिली की चलो ये इतनी भी बुरी नहीं है. अब फेस्ट का दिन आ गया था और लड़के इतने रोमांचित थे की सरस्वती वंदना पे भी नाच रहे थे. बहुत आतंक मचाया उस दिन तो लेट लेट के नागिन डांस चल रहा था.



पेपर के टाइम पर कॉलेज में ऐसा माहौल होता था जैसे किसी की शादी का प्रोग्राम हो ऐसे ऐसे चेहरे देखने को मिलते थे जो पहले कभी देखे ही नहीं. और हर तरफ लडको को किताब उठाये देखा जा सकता है. और तो और वो लौंडे भी पढते देखे जा सकते है जिनको सब्जेक्ट की फुल्ल्फोर्म भी नहीं पाता होती. और टॉयलेट की तो ऐसी हालत होती है जैसे लाइब्रेरी हो.

 पेपर से याद आया चलो में बताता हू की किस किस की एक्साम टाइम पे कैसी हालत होती थी.

गुलशन: इसका काम होता था पेपर से पहले रोना “ भाई कुछ ना आता “ और पेपर के बाद रोना “ भाई इस बार तो फैल हूँ “ और हमेशा पास हो जाता

ललित: सबसे देख तो लेता पर किसी को दिखाता नहीं

विशाल: एक्साम लिखने के लिए एक बार मुंडी नीचे करता तो एक्साम खत्म होने के बाद ही उठता. राम जाने क्या लिखता था.

पवन: इसको तो यही चिंता रहती थी की कब एक घंटा हो और ये बहार जाने दे.

राकेश: भाई तो मासूम सी शकल बना कर यहाँ वंहा ऐसे देखता था की कोई भला मानस पर्ची ही दे दे .

मोहित: देखना की पेपर में कौन क्या कर रहा है.

सतीश: भाई जैसा पेपर लेता था वैसा का वैसा वापिस पेपर से कोई छेड छाड नहीं.

सचिन: का  काम एक्साम से ठीक पहले ये पाता लगाना होता था की एक्सामिनर कौन है और उसके हिसाब से पर्चियो का जुगाड करना.

 

क्रिकेट ग्राउंड का लौंडे से बड़ा लगाव था गर्मी की भरी दुपहर में सारा सारा दिन बैट बजाते घूमते थे. जब भी वहा रेड पड़ती तो भारी तादाद में लौंडे बरामद होते. जिस क्लास का गेम का पीरियड होता पुरे कॉलेज की वही क्लास होती थी. पैसे मिला के गेंद लाना भी एक बड़ा काम होता. और सबसे बड़ी बात मैच खत्म होने के बाद दोनों टीमे कैंटीन पहुचती एक जीत की ख़ुशी में कैम्पा पीने दूसरी हार का गम भुलाने कैम्पा पीने.


                                           

 

ब से जस्सी गिल - बब्बल राय का कॉन्सर्ट होना तय हुआ था तभी से लौंडो में पूरा जोश था. तरह तरह के प्लान बनाए जाने लगे ये करंगे वो करेंगे. अब इस तरह के प्रोग्राम में जैसा की होता है चाहे कितनी ही बढ़िया तैयारी कर लो बच्क्चोदी हो ही जाती है बस वंहा भी वो ही हुआ. लौंडो की भारी मौजूदगी के चलते मामला गड़बड़ा गया. भैया अब दूर से तो कुछ दिखे नहीं तो में तो फूटबाल ग्राउंड के पोल पे जाकर बैठ गया देखते ही देखते बहुत सारे लौंडे भी वह इकठे हो गए


                                    .

फिर मुझे हमारी क्लास के लौंडे नाचते दिखाई दिए अपन तो वंहा चल दिए. तो उस टाइम भाई कॉलेज वालो ने ज़बरदस्त्त सोफे लगवाए थे. की स्पेशल गेस्ट आयंगे और बैठेंगे पर उन सोफों पर लौंडे लोग नाच रहे थे और उनमे भरी रुई हवा में लहरा रही थी. एक और बात अब मुझे भाई सीटी बजानी नहीं आती और बिना सीटी बजाये चैन नहीं आता. तो अपन तो बाजार से सीटी खरीद के ही गए वो क्या हैं न शौक बड़ी चीज़ है. तेन घंटे चले शानदार प्रोग्राम के बाद लौंडे लोग घर जाने लगे. तब जाते टाइम मैंने देखा तो वो फुटबॉल पोल वह नहीं था बिचारा मरा पड़ा था. आँखों में हंसी लिए अपन तो वह से निकल लिए. कुल मिला के पैसा वसूल दिन था.

                                  


नवम्बर और अप्रैल का महीने लडको के लिए काफी पीड़ा से भरा होता था. पेपर की टेंशन उपर से कॉलेज द्वारा नोटिस बोर्ड पर प्रेम पत्र लगा देते की इस 15 तारीख तक अपनी फीस जमा करा दो वरना लाख रुपे रोज का फाइन लगेगा. दूसरी तरफ रोल नंबर के लिए लड़के सारे कॉलेज में NOC लेते घूमते फिरते. इंडस्ट्रियल विजिट के नाम पर पास वाली कम्पनी में लौंडो को फोटो शूट के लिए ले जाया जाता. और भी कई तरह के वाकियात है जो बताने ठीक नहीं. और आखरी बात ये है की

"हो सकता है आपका कॉलेज अच्छा ना हो,
हो सकता है आपका कॉलेज दूर दराज गांव के खेतों में बसा हो,
हो सकता है कॉलेज में लड़किया सुन्दर ना हो,
हो सकता है फ़क्ल्टी अच्छे न हो"

ये भी हो सकता है की पूरे कॉलेज का कुछ भी अच्छा ना हो पर फिर भी एक ना एक दिन आप किसी एकांत में बैठे होंगे तो जरुर कहेंगे  “ यार वो भी क्या दिन थे “

तो भईया अपना तो ये ही नजरिया है की जैसा भी माहौल, दोस्त, लोग, मास्टर, टाइम  मिले कुबूल कर लो और बिंदास टाइम निकालो क्योकि जिंदगी के ये साल निकलने के बाद जिंदगी कितनी “ झंड “ हो जाती है ये आपको कॉलेज से निकलकर ही समझ आयगा. 

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शहीद PDF 



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सलाम ना आया (PDF)




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