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Showing posts from January, 2017

IAS सोनू

रात का वक्त हो चला है. डिम रोशनी में जलते उसबल्ब को देखता सोनू भयंकर सोच में है. अब शायद रिश्ता साजुड़ चला है उस जीरोवाट केबल्ब के साथ. ना जाने कितनी ही रात उसने उस बल्ब के साथ बातें की हैं.



आज शुरू होते ही खत्म हो जाने वाले इस कमरे में पूरे 2 साल हो चुके हैं. 2 साल हो चले हैं एक उम्मीद को पालते हुए. और हो चले हैं 2 साल इक सपने को जीते जीते.आज बात हो रही हैबल्ब सेकि किस कदर बीते हैं 2 साल.अब भी याद है जब वहउम्मीदों की पोटलीलिए दिल्ली आया था. चेहरे पर लाली और जुल्फें एकदम तेरे नाम के राधे भैया जैसी. पर अब 2 साल बाद राधे भईया वाली जुल्फे मनीष सिसोदिया के बालों में बदल चुकी हैं. 2 साल पहले वाला बाका सोनू हिंदी फिल्मो वाला लाला बन चुका है.पेट आ गयाहै सोनू को.
घर से आती उम्मीदों वाले फोन पर जब पूछा जाता कि बेटा पढ़ाई कैसे चल रही है. तो एक क्षण को सोचकर सोनू बोलता पढ़ाई तो अच्छी चल रही है माँ पर टाइम का नहीं मालूम कैसा चल रहा है.
जब छोटी बहन बोलती है कि " भैया इस राखी पर मुझे आप की लाल बत्ती वाली गाड़ी चाहिए ". फिर भी सोनू खामोशी से दबी आवाज़ में “हां” कर देता है.

पिता जी से अक्सर बात…

जाट आरक्षण

जाट आरक्षण (PDF)


फेर आगे थम लेके बेडा नाटक खूब दिखाओगे रोला घाल क सडका पे घरा ने फेर जलाओगे
लेरे गाड़ी लेरे किले रपिया की भी घाट नहीं जिद बेकार की होरी स ना लोड इसी कोई खास नहीं
भाई बड़े थम समझो थोडा अड़े कोई किसे ते डरता ना जरुरत पूरी हो जा से पर लालच का जी भरता ना
बस अर रेल जला के थम यो कुण सा जोर देखाओगे   जो नाम कमारे सेना में   सब माट्टी में मिलवाओगे
मेंढक ये बारिश आले इब नेता बन बन आवेंगे फर्क बता के ज़ात पात का भईया ने लडवावेंगे
बदला टेम स बदली चौधर “दीप“ पहले आली बात नहीं जो होया करते मान देश का वे पहले आले जाट नहीं
सोच के देखो वो नज़ारा के ओरा ते बतलाओगे भड़के दंगे जले हरयाणा अर थम आरक्षण पाओगे

प्रदीप सोनी

फैन होए हां

फैन होय हां (PDF)


अंखा ने कटार मुख चन्न वरगा तेरी अध तकनी दे फैन होए हां
इक तेरी बलिये नि संग मार गई कुज गल्ला दिया लाली दे नी मोहे होए हां
हुए ने मुरीद तेरे चिट्टे सूट दे राता कालिया सी ज़ुल्फा च खोये होए हां
बज दे ने बोल तेरे कन्ना विच नि लग दिए अंख जीवे सोये होए हां
तक ले नी मुड़ के तू जाण वालिये इन लमिया राहा च दिल खोये होए हां
बण चली हुन नि तू गीत “दीप “ दा रूप तेरा गीता च समोए होए हां 
प्रदीप सोनी 

मामा

ये वो जमाना था जब दसवी में बोर्ड के पेपर हुआ करते थे. खैर होते तो आज भी है पर उस ज़माने में खौफ इतना था की जैसे अगर नंबर कम आये तो फ़ासी हो जायगी या अमरीका परमाणु बम गिरा देगा या फिर राहुल गाँधी प्रधानमंत्री बन जायगा. अक्टूबर का महिना आ चूका था और स्कूल वालो ने कहा की “ सब बच्चे अपनी पासपोर्ट साइज़ फोटो सोमवार तक जमा करा दो CBSE को भेजनी है.

तब हमारा एक दोस्त था चंदर मतलब चंदर  और बच्चे प्यार से उसे मामा बुलाते थे.” तेरे “ नाम देखने के बाद मामा को बड़े बाल रखने का शौक हुआ. और थोड़े दिनों में जुल्फे में सलमान के तेरे नाम की तरह लहराने लगी. और जब स्कूल की छुट्टी के बाद मामा  अपनी लेडीज साइकिल पे घर जाये तब नजारा ही अलग होता था. लडकिया तो लडकिया लौंडे भी उसे मुड मुड के देखे.


तब सारे दोस्तों ने सोचा की आज शाम को चलते है रूबी ( फोटोग्राफर ). तब शाम को सब अपनी अपनी लम्बोर्गिनी लेकर चल पड़े.  मेरी लम्बोर्गिनी की चैन बार बार उतर जाती इसलिए सभी मेरी प्यारी लम्बोर्गिनी को खटारा कह रहे थे मुर्ख प्राणी. रूबी के बहार बड़ा सा बोर्ड लगा हुआ था. “ 50 रुपे में 50 पासपोर्ट साइज़ फोटो  2 मिनट में”.
वंहा पहुचते ही…