IAS सोनू

January 28, 2017



रात का वक्त हो चला है. डिम रोशनी में जलते उस  बल्ब को देखता सोनू भयंकर सोच में है. अब शायद रिश्ता सा  जुड़ चला है उस जीरो  वाट के  बल्ब के साथ. ना जाने कितनी ही रात उसने उस बल्ब के साथ बातें की हैं.



आज शुरू होते ही खत्म हो जाने वाले इस कमरे में पूरे 2 साल हो चुके हैं. 2 साल हो चले हैं एक उम्मीद को पालते हुए. और हो चले हैं 2 साल इक सपने को जीते जीते.  आज बात हो रही है  बल्ब से  कि किस कदर बीते हैं 2 साल.  अब भी याद है जब वह  उम्मीदों की पोटली  लिए दिल्ली आया था. चेहरे पर लाली और जुल्फें एकदम तेरे नाम के राधे भैया जैसी. पर अब 2 साल बाद राधे भईया वाली जुल्फे मनीष सिसोदिया के बालों में बदल चुकी हैं. 2 साल पहले वाला बाका सोनू हिंदी फिल्मो वाला लाला बन चुका है.  पेट आ गया  है सोनू को.

 घर से आती उम्मीदों वाले फोन पर जब पूछा जाता कि बेटा पढ़ाई कैसे चल रही है. तो एक क्षण को सोचकर सोनू बोलता पढ़ाई तो अच्छी चल रही है माँ पर टाइम का नहीं मालूम कैसा चल रहा है.

जब छोटी बहन बोलती है कि " भैया इस राखी पर मुझे आप की लाल बत्ती वाली गाड़ी चाहिए ". फिर भी सोनू खामोशी से दबी आवाज़ मेंहांकर देता है.


पिता जी से अक्सर बात नहीं होती लेकिन सोनू जानता है कि यह फैसला उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं था. खेती के बोझ तले दबे पिताजी किस तरह सोनू की फीस चुका रहे हैं इस बात का अंदाजा है  उसे और चाह कर भी कुछ ना कर पाना सोनू को बहुत अखरता है.  जब वह शहर से आते अमीर बाप के लौंडों को पैसा खर्चा करते हुए देखता है और जिंदगी और जवानी के नजारे लेते देखता है तो कंबखत मन तो बहुत होता है कि वह भी धोए बहती गंगा में हाथ. पर घर की हालत और घरवालों की उम्मीद उसे बांधे रखती है.  वो उम्मीद जिसके लिए पिताजी ने  50000 का  कर्जा लिया था. वो उम्मीद जिसे  मां हर मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में मांगती है अपने लाल के लिए लाल बत्ती. वो उम्मीद जिसे छोटी बहन सोमवार के व्रत तो करती है लेकिन अपने होने वाले पति के लिए नहीं  बल्कि अपने भाई की लाल बत्ती के लिए.

वैसे तो  सोनू व्हट्स अप्प और फेसबुक  से दूर हो चला है. फिर भी  कभी कभार  देख ही लेता है की दीन दुनिया की आनी जानी. वो देखता है कॉलेज का मनोहर अमेरिका में किसी कंपनी में एक्जिक्यूटिव बन चुका है. क्लास की मोटी सी शालिनी किसी कॉलेज में लेक्चरार लग चुकी है. राहुल जो कभी मरियल सा दिखाई देता था. आज वो भी पेट फुला कर घूम रहा है. और वो देखता है की उसके लिए कभी खास रही नेहा. जिसकी शादी हो चुकी है और अपने पति के साथ बैंकॉक में छुट्टियाँ मना  रही है. और स्टेटस डाल रही  है. एन्जोयिंग हॉलीडेज विद माय लवली हब्बी”.

सोनू जब दिल्ली यूनिवर्सिटी के  लौंडों को देखता  लड़कियां घुमाते हुए. तो कहीं ना कहीं उस बच्चे दिल में  भी प्यार मोहब्बत का एहसास जगता है. और वह सोचता है “अरे साला हम भी कर के देखेंगे ये“. फिर दिमाग में वही बात घूम जाती है.   लड़कियां पढ़ाई के लिए हानिकारक है”. 

जब  बड़े बाप के लौंडो को  वह देखता है “मैकडोनाल्ड और KFC”  में खाते हुए तो मन तो बहुत होता है खाने का.  पर जेब में पड़े 30 रूपय उसको उसकी औकात का हवाला देते हैं. उस वक्त सोनू की हालत ठीक उस छोटे बच्चे जैसी होती है जो दूर खड़ा खिलौने की दुकान में खिलौनों को निहार  तो रहा होता है. पर बदनसीब  इतना की खरीद नहीं सकता.

जब कभी अपने बीते दिनों को याद करता है. तो दुनिया से छुप छुप कर रो भी देता है लेकिन बड़ा हौसला चाहिए खुद को चुप कराने में.


दुनिया का भूगोल, इतिहास, भौतिकी, रसायन शास्त्र और ना जाने कितने प्रकार के अस्त्र शास्त्र सोनू ने 2 साल में पढ़े और अनुभव किए हैं. होनोलूलू और युगांडा जैसी जगहों के बारे में पढ़ा. प्राचीन काल से लेकर भविष्य काल तक की सारी जानकारी किताबों में  ढूंढी. पर  जानकारियां इकट्ठे करते करते सोनू खुद को खो चुका है. अब वो थक चुका है लौटना चाहता है अपने  शहर और जाकर बटाए हाथ अपने पिताजी का और खाए खाना अपनी मां के हाथों का और करे लड़ाई अपनी छोटी बहन के साथ.

पर अब शायद उसकी जरूरत ना पड़े. क्योंकि अब सोनू की गाड़ी पर लाल बत्ती लग चुकी है. ऊपर नीचे काम करने वाले मुलाज़िम  सोनू को सलाम करते हैं. पिताजी बड़े फक्र से मोहल्ले में बताते हैं कि मैं IAS सोनू का बाप हूं. मां बड़े इत्मीनान से बोलती है मेरा बेटा IAS है. और बहन  लाल बत्ती वाली गाड़ी में कॉलेज जाने के सपने को सच कर रही है. और सोनू सीना तान के कर्जा लिए उन ₹50000 को वापस कर अपने पिताजी की जमीन के कागजात पिताजी के हाथ में देता है. और पिताजी की आंखें खुशी के मारे भर आती हैं और  वो अपने  सपूत को  सीने से लगा कर रोने लगते हैं. शायद उनकी सालों की तपस्या का परिणाम मिल चुका है. और अब उन्हें मोहल्ले वाले IAS सोनू का पिता बोलते हैं.

अचानक से सुबह के 4:00 बजे का अलार्म  बजता है.  और सोनू अलमारी पर रखी संविधान की किताब उठाकर पढ़ने लगता है कानूनी धाराओं को.  दिल में गर्मजोशी लिए क्योंकि बताया है  बड़ों ने कि सुबह के सपने अक्सर सच होते हैं.

और इस तरह की उम्मीद लिए भारत से ना जाने कितने सोनू उस सपनों की मंडी में बसते हैं. जिसका नाम है मुखर्जी नगर. और कभी किसी सोनू को कम मत समझना. हो सकता है वह  सोनू आगे चलकर  देश की चाल निर्धारित करें. और राजा बेटा की तरफ से सलाम है उन सभी सोनू को जो दिन रात मोह माया से परे होकर  लगे हैं आपने और अपने माँ बापू के सपने को साकार करने में.

पढ़ने के लिए धन्यवाद…. बहुत-बहुत शुक्रिया…. बहुत-बहुत आभार



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