Skip to main content

पेपर और धक्के


सर्दियों ने भी जुल्म किया हुआ है कम्बखत दिन निकल कर कब रात हो जाती है अँधेरे अँधेरे में कुछ पता ही नहीं लगता ऊपर से पेपर की चिंता अलग. बिलकुल ऐसा लगता है जैसे बर्फ की सिल्ली पर लेटकर बेल्ट मारी जा रही हो. वो तो सभी को पता ही है कहा मारी जाती है.
यार कल सुबह पेपर है और पढ़ा भी कुछ नहीं और उससे भी बड़ी टेंशन कल पेपर के टाइम तक कॉलेज पहुंचेगे भी या किसी मोड़ पे खड़े होकर लिफ्ट मांगते घूमेंगे. कोहरे की वजह से बस लेट हो जाये, आँख ना खुला और सौ बात. इन्ही खयालो ने ही मुझे और टीटू को 10 मिनट के अन्दर बस स्टैंड पंहुचा दिया. मैं और टीटू हाथ में झोला लिए बस स्टैंड पे झज्जर वाली बस के सामनेखड़े थे. तो भाई मौसम बड़ा ही सुहाना सा था एकदम आसमान काली घटाओ से घिरा हुआ मंद मंद सर्दी. बोले तो सेक्सी मौसम. हिंदी फिल्मो में जिसे बेईमान मौसम कहा जाता है.
“ सीटी बजी “ "चलो भाई सारे बैठ लो चल पड़ी बस." अब भईया अपनी बसों में ये रुल था की अगर बस के अन्दर बैठ के गए तो 25 रुपे किराया और छत पर बैठ कर गए तो 15 रुपे किराया. तब मैंने और टीटू ने दिमाग लगाया की छत पर ही चलते है यार 10 – 10 रुपे बचेंगे उतर के समोसे खायंगे.

फिर हम हो लिए छत पर सवार. शहर में तो ठीक था पर जैसे ही बस हाईवे पर उतरी कमबख्त ऐसा लग रहा था जैसे सर्दी महाराज हमारा ही इंतज़ार कर रहे थे. सर्दी देवता ने अपने तीर हम गरीबो पर दागने शुरू कर दिए. उस ज़माने में झज्जर वाला हाइवे गढ़ों वाला हाइवे होता था ड्राईवर ताऊ भी आज फुल साप की तरह बस चला रहा था और तो और बस का हॉर्न भी “ तन डोले मेरा मन डोले मेरे दिल का गया करार हाय ये कौन बजाये बसुरिया “ वाली हॉर्न टोन का था. में और टीटू बड़ी ही विकट समस्या में थे ऊपर से ये सर्दी ना जीने दे और नीचे से ये गढ़े तब मैंने टीटू को कहा भाई अगर आज जिन्दा उतर गए तो हनुमान मंदिर चलकर 20 रुपे का प्रसाद चढ़ाएंगे.


दूर दूर तक खेत ही खेत और उनमे लगी सरसों की फसल जिसे सजाया था उन पीले रंग के छोटे छोटे फूलो ने और कोहरे की हलकी सी उस चादर ने. नजारा प्रकृति के बेहद सुंदर रूप को दर्शा रहा था. वो दूर बनी झोपडी और उसके पास वाले पेड़ पर बंधी वो सफेद रंग की गाय. वो दीवार पर गोबर के उपले बनती ताई, और दूर कुए से पानी लाती भाभी समान लेडीज, वो लकड़ी हाथ में लिए भैसों को पानी पिलाने ले जाता भाई और लकड़ी जला कर हुक्के का सेवन करते गाँव के बड़े बूढ़े ताऊ लोग. ये नजारा हमे समय के उस दौर में ले गया जिसमे हरयाणा की असली झलक दिखाई देती है.
ओ तेरी बहन की ..... " अरे टीटू डंडा कस के पकड़ भाई वरना ऐसी वैसी जगह चोट लग जायगी की सारी जिन्दगी तनाव में रहेंगे". यार मां कसम अगली बार से नीचे ही बैठ के आयंगे 20 रुपे बचाने के चक्कर में अपनी 200 की पेंट फड वाले अब. पेंट की देखि जाये पर वो भी तो फटती है यार .


जैसे तैसे कर के झज्जर आया और हम उतर के भगवान से माफ़ी मांगते हुए समोसे खाने निकल पड़े. “हे भगवान आप पैसे का क्या करोगे हम गरीब लोग समोसा ही खा लेते हैं प्लीज भगवान माफ कर देना शक्रिया”.  " भाईसाहब  10 - 10 के दो समोसे दे दो.

चल भाई टीटू कीर्ति को फ़ोन कर ले की हमे लेने आ जाये. तब कीर्ति अपने 25 साल पुराने कछे सामान हाफ पेंट में हमे लेने आया. वो कच्छा ऐसा लगता था जैसे कीर्ति के पड़ दादा ने कीर्ति के दादा को दिया हो और कीर्ति के दादा ने कीर्ति को. तब हम लोग उस धर्मशाला पर बने चौबारे वाले कमरे में गए जहाँ कीर्ति ने डेरा डाला हुआ था. कमरा कमबख्त इतना बड़ा था कि पता ही ना लगे कहां शुरू होता है कहां खत्म. और कीर्ति की किताबें देखकर तो ऐसा लग रहा था कि मानो कुछ रिसर्च कर रहा हो. हे भगवान इतनी किताबें भी कोई रखता है. बगल वाले कमरे से जोर जोर से गानों की आवाज आ रही थी लगता है कुछ तरल पदार्थ पीकर संस्कृति कार्यक्रम हो रहा है.


मैं: भाई कीर्ति बोहोत तेज भूख लग रही है कुछ खाने को दे दे भाई.

कीर्ति: भाई खाने को तो कुछ ना है यार..

मैं: यार हम कमरे पे आये है तू खाने को भी नहीं देगा

कीर्ति: अब भाई रिश्तेदारी में थोड़ी आये हो जो मैं खाना बना के दु.

मैं: भाई नहीं है यार..?? बना ले यार कुछ

कीर्ति: चल ठीक है भाई चावल रखे हैं चढ़ाऊं अभी



इसी के साथ बावर्ची कीर्ति अपने काम में जुट गया.  जाकर बिचारा कढ़ाई धो कर लाया जो पिछले 5 दिनों से धुलने का इंतजार कर रही थी. और मसालों के डब्बे देख कर तो ऐसा लग रहा था मानो म्यूजियम जाने का इंतजार कर रहे हो . और कमरे में जलता 100  वाट का पीली रोशनी वाला सूर्य बल्ब. ऐसी दुनिया में ले जा रहा था जहां सिर्फ स्ट्रगल बसता है.  पता नहीं बड़ी शांति सी मिल रही थी उस १०० वाट के लड्डू को देखकर.  लग रहा था इससे कोई पुराना रिश्ता सा है.  फिर ध्यान आया अरे यह तो हमारी लेट्रिंग में भी लगा हुआ है तब पता लगा की इससे तो बहुत पुराना रिश्ता है यार.

पूरे 2 घंटे बाद कीर्ति चावल बना कर लाया.  मैंने और टीटू ने चावल को देखा और देखते ही हमारी भूख मर गई. लेकिन हम कीर्ती का दिल नहीं दुखा सकते .बेचारे ने कढ़ाई मांजकर बड़ी मेहनत करके चावल बनाए थे तो मैंने और टीटू ने खाने की कोशिश की.


मैं: भाई कीर्ति चावल तो एक नंबर बनाए हैं “मन ही मन कह रहा था क्या टट्टी चावल बनाए हैं”
टीटू: हां भाई कीर्ति मस्त चावल है
कीर्ति: अरे कम लगा रहे हो क्या भाई को.


बड़ी मुश्किल से आधे पके चावल खाकर हमने रात गुजारी.  लेकिन एडवेंचर अभी खत्म नहीं हुआ था क्योंकि अभी एक बेड पर तीन लोगों को फसना था.  मैंने तो पिलंग और दीवार का कोना पकड़ा और लंबा लेट होकर सो गया. पर सारी रात टीटू और कीर्ति एक दूसरे के मुंह पर लात बरसाते रहे.


जैसे-तैसे दिन निकला पढ़ाई तो घंटा नहीं की थी खैर कर भी लेते तो क्या उखाड़ लेते.  मां कसम पैंट फाड़ सर्दी हो रही थी.


मैं: अरे खड़ा हो भाई…. अरे ओ कुंभकरण खड़ा हो ले….. भाई आधा घंटा रह रहा है पेपर मे
टीटू: भाई कीर्ति गर्म पानी मिलेगा
कीर्ति: ना भाई बाहर अंगीठी रखि रखी है कहे तो लगा दूं
मैं: बस भाई बहुत-बहुत शुक्रिया रहने ही दे

मुंह पर ठंडा पानी मार कर हम तीनों कमरे से टेंपो स्टैंड पर पहुंच गए. कमबखत इतनी सर्दी क्यों होती है और खेतों के बीच में तो ऐसी सर्दी होती है ऐसी सर्दी होती है मतलब बहुत सर्दी होती है.

मैं: अरे भैया चला लो यार पेपर है
टेम्पो वाला : रुक जा भाई आठ सवारी होने दे
मैं: यार भाई यहां पेपर निकल रहा है तुझे सवारी की पड़ी है
टेम्पो वाला :भाई तुम दे देना 8 सवारियों के पैसे मैं तो चल दूंगा
मैं: भाई भगवान से डर एक दिन मरना भी है.


जैसे ही सवारी पूरी हुई टंपू की खिड़कियों से बांधे उस नीले कवर को नीचे कर दिया.  कसम से टंपू भी मारुति 800 की फीलिंग दे रहा था.



टेंपो रुका


मैं :अरे भाई कुछ दिख नहीं रहा फिर भी देख लेना कॉलेज ही है या रास्ते में ही उतार दिया
टीटू ने थोड़ा नजदीक जाकर देखा हां भाई आजा कॉलेज ही है
मैं :साले मजाक कर रहा हूं मेरी सारी बातों को सीरियसली क्यों ले जाता है बे तू


चल कीर्ति तेरा किराया आज भाई देगा तू भी क्या याद रखेगा की कोई रहीस आया था.

बस इतनी से थी ये कहानी


और बोहोत से लोगों का कॉलेज जीवन इसी तरह गर्मी की भट्टी और सर्दी की ठंड में तपकर निकलता है. हो सकता है कि वो लोग पढ़ाई और ज्ञान के मामले में उनका मुकाबला ना कर पाए जो किसी प्रतिष्ठित या बेहतर सुविधा वाले कॉलेज में पढ़ते हैं.  लेकिन दुनियादारी की जो समझ देसी लौंडो में पाई जाती है वह दुनियादारी की समझ पाने में शेहरी योयो टाइप लौंडे आधी जिंदगी निकाल देते हैं


कहानी पढ़ने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया सभी को हवा में प्रणाम

Comments

Popular posts from this blog

अलविदा अम्मा

कल रात से ही माहौल गरमाया हुआ था और लोग हॉस्पिटल के सामने, सडको पर और जंहा जगह मिल जाये वंही भगवान को मानाने में लगे हुए थे. पर इस बार ऐसा लग रहा था की भगवान नहीं मानेंगे मगर लोग तो बिचारे भोले भाले होते है.
आज सुबहे 5 बजे अलार्म बजा तो देखा की टीवी चल रहा है और साथ वाले पलंग पर लेटे लातिश भाई बोले “ AMMA NO MORE YAAR”. मुझे लगा की लातिश भाई भी अम्मा के हार्डकोर फैन है. वैसे भी अपन को या कहे की सभी को पहले से ही आईडिया हो गया था की ज्यादा टाइम है नहीं अम्मा के पास. आज सारा दिन चर्चा का मुद्दा रही अम्मा टीवी, लोग, सड़क जहा देखो अम्मा ही अम्मा हो रही थी. मुझे तमिल नाडू का राजनीती तंत्र अजीब या कहे व्यक्ति केन्द्रित लगता है यहाँ के लोग राजनेताओ को भगवान का दर्जा देते है. नेताओ द्वारा अम्मा के पैर छूने की बात तो जग जाहिर है. कहा जाता है की शादी के टाइम लोग जयललिता जी की बड़ी सी मूर्ति आशीर्वाद देते हुए लगते है जिसमे हाथो से अम्मा फूल बरसाती है. मतलब अम्मा को भगवान का दर्जा है.


कुछ लोगो के साथ हुई बाते आप लोगो से साझा करता हूँ ये लोग तमिल नाडू के निवासी या वंहा से तालुक रखते है: 
अम्मा ने गरीबो …

Life @ MRK

इस पोस्ट का मकसद किसी भी तरह से कॉलेज की प्रशंसा या बुराई करना नहीं है. ये पूर्ण रूप से व्यक्तिगत विचार है अगर ये विचार किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु के विचारों से मेल खाते है तो उसे महज संयोग और मेरा दोस्त कहा जायगा.
हरियाणा के दक्षिण में बसे शहर रेवाड़ी से 7 किलोमीटर दूर खेतो के बीचो बीच उगे इस कॉलेज को “ MATA RAJ KAUR INSTITUTE OF ENGINEERING & TECHNOLOGY “ नाम से जाना जाता है.बनावट के हिसाब से ठीक ठाक ज़बरदस्त, स्टाफ के हिसाब से भी कुल मिला के बढ़िया. सुविधाओं के लिहाज से अच्छा कहा जा सकता है. खेतो के बीच में बसे होने के कारण लडको को कॉलेज से फरार होकर पिक्चर देखने जाने में काफी परेशानी उठानी पड़ती है. कभी कभी तो कॉलेज से भागे लड़के ऑटो ना मिलने की वजह से वापिस कॉलेज ही आ जाते है. कॉलेज की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा हरयाणा के बहार के लौंडो का भी होता है. जो थोड़े दिन में हरयाणवी बोलते देखे जा सकते है. अब काफी लोगों के मन में सवाल आया होगा की लड़कियाँ कैसी है भाई तो अपना जवाब है जैसा देखने वाला देखे. बाकि अपन को तो कोई खास लगी नहीं.


अब सब सोच रहे होंगे के ये सब क्यों बताया जा रहा है तो लिजीये …

A PHOTOGRAPHIC VISIT TO HARYANVI CULTURE

शहीद

शहीद PDF 



वो रोज धमाके सुनते है
जीते हैं जंग के साये में
वो खडे हुए हैं सीमा पर
ले असला अपनी बाहों में

गोलियों की बरसात में
वो लाल लहू से नहाते हैं
होली हो या दिवाली हो
सब सीमा पर ही मनाते हैं

इक आस जो घर पर जाने की
जो पल भर में धुल जाती है
सीमा पार से आकर गोली
साथी को डंस जाती है

फिर कहते हैं इस हालत में
हम घर को जा सकते नहीं
सर कटा सकते हैं लेकिन
सर झुका सकते नहीं
फिर खून खौल सा जाता है
रह रह कर गुस्सा आता है
वो घुंट लहू का पीते हैं
मर मर कर फिर भी जीते हैं

इस वतन चमन के खातिर
अपनी जान देश पर वार गए
खाकर गोली सीने पर वो
सीधे स्वर्ग सीधार गए

सजा तिरंगे में अर्थी‎ जब
घर पर लाई जाती है
याद करा कर कुर्बानी
गोलियां चलाई जाती हैं

सरकारी दलाल भी आते हैं
शहादत गिनाई जाती है
लाख रुपे का चैक दिखा कर
फोटो खिचवाई जाती है

बस इतना सा ये किस्सा है
बस इतनी सी ये कहानी है
ना इनका कोई बुढ़ापा है

सलाम ना आया

सलाम ना आया (PDF)




थी गुफ़्तगू इक आने के उसकी ढल चला आफताब पर पैगाम ना आया
चढ़ा था सुरूर मय खाने में थे हम पर सदियों से प्यासों का वो “जाम” ना आया
खड़े थे कुचे में इक झलक ऐ दीदार को वो आये नज़र मिली पर सलाम ना आया
मिली बदनामिया और मिली शौहरते पर हसरतों वाला दिली मुकाम ना आया
उसका था शहर और उसकी अदालते हम हुए हलाक उसे इल्जाम ना आया
“दीप” हुआ बदनाम सारे इस जंहा में  पर उस बेवफा का कही नाम ना आया
प्रदीप सोनी 

मेरे गुरु है नमन तुम्हे

दूर तलक था अँधियारा
जब जीवन का आगाज हुआ

अनजाना सफ़र अनजानी डगर
मकसद जीवन का राज हुआ

जो मिले आप तो मिला साथ
किसी धुन का जैसे साज हुआ

इस ज्ञान डगर पर चलने से
मुझे जीने का अंदाज हुआ

बन दीप गुरु जब आप जले
तो रोशन ये संसार हुआ

हे मेरे गुरु है नमन तुम्हें
मेरा धन्य जीवन आज हुआ


प्रदीप सोनी

IAS सोनू

रात का वक्त हो चला है. डिम रोशनी में जलते उसबल्ब को देखता सोनू भयंकर सोच में है. अब शायद रिश्ता साजुड़ चला है उस जीरोवाट केबल्ब के साथ. ना जाने कितनी ही रात उसने उस बल्ब के साथ बातें की हैं.



आज शुरू होते ही खत्म हो जाने वाले इस कमरे में पूरे 2 साल हो चुके हैं. 2 साल हो चले हैं एक उम्मीद को पालते हुए. और हो चले हैं 2 साल इक सपने को जीते जीते.आज बात हो रही हैबल्ब सेकि किस कदर बीते हैं 2 साल.अब भी याद है जब वहउम्मीदों की पोटलीलिए दिल्ली आया था. चेहरे पर लाली और जुल्फें एकदम तेरे नाम के राधे भैया जैसी. पर अब 2 साल बाद राधे भईया वाली जुल्फे मनीष सिसोदिया के बालों में बदल चुकी हैं. 2 साल पहले वाला बाका सोनू हिंदी फिल्मो वाला लाला बन चुका है.पेट आ गयाहै सोनू को.
घर से आती उम्मीदों वाले फोन पर जब पूछा जाता कि बेटा पढ़ाई कैसे चल रही है. तो एक क्षण को सोचकर सोनू बोलता पढ़ाई तो अच्छी चल रही है माँ पर टाइम का नहीं मालूम कैसा चल रहा है.
जब छोटी बहन बोलती है कि " भैया इस राखी पर मुझे आप की लाल बत्ती वाली गाड़ी चाहिए ". फिर भी सोनू खामोशी से दबी आवाज़ में “हां” कर देता है.

पिता जी से अक्सर बात…

भारतीय माँ के हथियार

भारतीय माँ के हथियार