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मंगलवार और मंदिर


 " अरे यार  गोपू आज का मैच तो हरवा दिया यार मोटा सेंटर लग जाता है और जो भी बोल आये सीधा बहार मार दे और वो लम्बू नेटर की औलाद सारी बोल नेट में ही दे मारे. खामखा हरवा दिए आज."






अंकल 11 रुपए का दो जगह  गरमा गरम प्रसाद दे दो

मैं: अरे यार आज तो बड़ी लंबी लाइन है  थोड़ा लेट हो गए अपन
गोपाल: हा यार


यह वाकया है उन दिनों का जब हम स्कूल में हुआ करते थे तब मैं और मेरा दोस्त गोपाल अक्सर हर मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर जाया करते. तकरीबन 7:00 से 7:30 के बीच में हम लोग हनुमान जी से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगने पहुंचते. लाइन अक्सर लंबी हुआ करती क्योंकि पाप धोने के लिए बहुत से प्रसाद नाम का साबुन लिए खड़े रहते.


बड़े सालों से चल रहा है हमारा यह सिस्टम


मैं: अरे गोपाल वह देख अपनी क्लास की मोटी
गोपाल: अरे हां भाई
मैं: देखना  जरूर देखेगी
गोपाल: ना  देखा यार
मैं: कोई ना भाई तु मन मत मार और लड़कियां दिखाऊंगा  मेरे भाई को टेंशन मत ले तू.
गोपाल: अरे पागल है क्या यार अपन मंदिर आये हैं भगवान पाप देंगे लड़कियों को मत देखा भी भगवान को याद कर बस
मैं: सही कह रहा है भाई तू तूने तो मेरी आँखे खोल दी " जय हनुमान ज्ञान गुण सागर जय कपीस... "



दूर से कोई भाई साहब ने जयकारा लगाया “ बोल सिया वर राम चंद्र की …... जय”  "बोल पवनसुत हनुमान की….. जय.


फिर से माहौल कुछ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक हुआ.


मैं: गोपाल प्रसाद गरम है ना ??
गोपाल: हाँ भाई मेरे तो हाथ भी जल गए
मैं: कोई न घर जाकर कोलगेट लगा लियो
मैं: भाई उसको कितने नंबर
गोपाल: भाई दो नंबर
मैं: और वह हरे सूट वाली को
गोपाल: भाई उसको पुरे तीन
मैं: ना यार तीन ज्यादा हो जाएंगे
गोपाल:अरे दे दे कोई बात नहीं यार
मैं: चल ठीक है  गोपाल तू  कह रहा है तो  देता हूं वरना वो है नहीं दो नंबर से ज्यादा
मैं: अरे यार गोपाल अपन मंदिर आए हैं भगवान पर कंसंट्रेट कर वैसे ही अपने खाते खराब चल रहे हैं
गोपाल:हाँ भाई तू सही कह रहा है.

आध्यात्मिक भाईसाहब: बोल बजरंग बलि महाराज की जय
मैं: जय
गोपाल: जय


मैं: अच्छा गोपाल अब लास्ट बता उस जींस उसको कितने नंबर
गोपाल: मेरी तरफ से 4.00
मैं : मेरी तरफ से 3:00
मैं: ना यार गोपाल तू हमेशा ज्यादा नंबर देता है
गोपाल: चल कोई ना भाई यार

मैं: चल अब मंदिर में आ गए अब कोई लडकियों की बात नहीं करेगा 
गोपाल: हाँ बिलकुल भाई 

मैं: गोपाल आईडिया
गोपाल: हां बता भाई
मैं: एक काम करते हैं अभी ढंग से देख लेते है और नंबर है और भगवान से एक ही बार में माफी मांग लेंगे
गोपाल: अरे भाई बहुत अच्छा आईडिया है तो


मैं: अच्छा वह लाल वाली के
गोपाल:उसके दो नंबर भाई
मैं और वह पिंक वाली के
गोपाल: पूरे 3


टन टन टन


आध्यात्मिक भाईसाहब: " बोल बजरंग बलि की जय "
मैं: जय
गोपाल: जय  

मैं: अरे मोटी अपने पापा के साथ आई है
गोपाल: हां लग तो रहा है भाई



मैं: चल बता आज हनुमान चालीसा ही करें या बजरंग बाण भी कर लें
गोपाल: अरे यार अभी सब्जी लेने भी जाना है खाली हनुमान चालीसा कर के ही घर चलते हैं


मैं: “  हे भगवान हम भोले-भाले बच्चों को क्षमा कर देना और इतनी शक्ति दो कि मोह माया से परे हो पाए जय हनुमान
जय हनुमान जय हनुमान जय सियाराम”

और आखिर हनुमान चालीसा पढ़कर मुर्गे की मुद्रा में झुकर उठने पर ऐसा लगता था जैसे सारे पाप धुल चुके है ओर कुछ इस कदर निकलते थे हमारे बचपन के मंगलवार

" कम्बखत वो भी दिन थे और हम भी हरामी थे बाकि सभी को हवा में प्रणाम "

फोटो सौजन्य: https://www.facebook.com/rewaricity/

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अलविदा अम्मा

कल रात से ही माहौल गरमाया हुआ था और लोग हॉस्पिटल के सामने, सडको पर और जंहा जगह मिल जाये वंही भगवान को मानाने में लगे हुए थे. पर इस बार ऐसा लग रहा था की भगवान नहीं मानेंगे मगर लोग तो बिचारे भोले भाले होते है.
आज सुबहे 5 बजे अलार्म बजा तो देखा की टीवी चल रहा है और साथ वाले पलंग पर लेटे लातिश भाई बोले “ AMMA NO MORE YAAR”. मुझे लगा की लातिश भाई भी अम्मा के हार्डकोर फैन है. वैसे भी अपन को या कहे की सभी को पहले से ही आईडिया हो गया था की ज्यादा टाइम है नहीं अम्मा के पास. आज सारा दिन चर्चा का मुद्दा रही अम्मा टीवी, लोग, सड़क जहा देखो अम्मा ही अम्मा हो रही थी. मुझे तमिल नाडू का राजनीती तंत्र अजीब या कहे व्यक्ति केन्द्रित लगता है यहाँ के लोग राजनेताओ को भगवान का दर्जा देते है. नेताओ द्वारा अम्मा के पैर छूने की बात तो जग जाहिर है. कहा जाता है की शादी के टाइम लोग जयललिता जी की बड़ी सी मूर्ति आशीर्वाद देते हुए लगते है जिसमे हाथो से अम्मा फूल बरसाती है. मतलब अम्मा को भगवान का दर्जा है.


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Life @ MRK

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अब सब सोच रहे होंगे के ये सब क्यों बताया जा रहा है तो लिजीये …

A PHOTOGRAPHIC VISIT TO HARYANVI CULTURE

शहीद

शहीद PDF 



वो रोज धमाके सुनते है
जीते हैं जंग के साये में
वो खडे हुए हैं सीमा पर
ले असला अपनी बाहों में

गोलियों की बरसात में
वो लाल लहू से नहाते हैं
होली हो या दिवाली हो
सब सीमा पर ही मनाते हैं

इक आस जो घर पर जाने की
जो पल भर में धुल जाती है
सीमा पार से आकर गोली
साथी को डंस जाती है

फिर कहते हैं इस हालत में
हम घर को जा सकते नहीं
सर कटा सकते हैं लेकिन
सर झुका सकते नहीं
फिर खून खौल सा जाता है
रह रह कर गुस्सा आता है
वो घुंट लहू का पीते हैं
मर मर कर फिर भी जीते हैं

इस वतन चमन के खातिर
अपनी जान देश पर वार गए
खाकर गोली सीने पर वो
सीधे स्वर्ग सीधार गए

सजा तिरंगे में अर्थी‎ जब
घर पर लाई जाती है
याद करा कर कुर्बानी
गोलियां चलाई जाती हैं

सरकारी दलाल भी आते हैं
शहादत गिनाई जाती है
लाख रुपे का चैक दिखा कर
फोटो खिचवाई जाती है

बस इतना सा ये किस्सा है
बस इतनी सी ये कहानी है
ना इनका कोई बुढ़ापा है

सलाम ना आया

सलाम ना आया (PDF)




थी गुफ़्तगू इक आने के उसकी ढल चला आफताब पर पैगाम ना आया
चढ़ा था सुरूर मय खाने में थे हम पर सदियों से प्यासों का वो “जाम” ना आया
खड़े थे कुचे में इक झलक ऐ दीदार को वो आये नज़र मिली पर सलाम ना आया
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प्रदीप सोनी 

IAS सोनू

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