तीज

May 03, 2017



“ नायक नहीं खलनायक हूँ मैं जुल्मी बड़ा दुःख दायक हूँ मैं ” कही दूर दराज इलाके से आती ये तेज ध्वनि कानो में पड़ रही थी. फराटे पंखे की तीव्र आवाज भी उसे रोक पाने में अशक्षम थी. जैसे ही आंखे खोली तो नजारा भोर का था. तभी एकदम दिमाग में भयंकर प्रतिक्रिया हुई. जैसी तब होती है जब कोई गाल पे चांटा मार दे.



“ओए खड़ा हो दिन निकल गया” टिंकू भी फटा फट खड़ा हुआ और हम दोनों कमरे में भागे और तुरंत प्रभाव से स्पीकर और VCD प्लयेर लेकर छत पर भागे साला जल्दी जल्दी में पॉवर केबल तो नीचे ही रह गयी “ जा टिंकू भाग के ला ”

गोली की रफ़्तार से सारा काम समेट मारा
 “बता टिंकू कौन सा गाना लगाऊ”
“मित्रा दी छतरी ते उड़ गयी” लगा दे

गाना बज गया फिर तबियत से आसमान की तरफ देखा
“आज तो माँ कसम स्वाद आने वाला है बड़ा रंगीन है आसमान” कम्बखत पूरा मोहोल्ला छत पर था. आज पता लग रहा है हमारे महोल्ले में कितने लोग रहते है. मतलब दुनिया भर के लोग भरे पड़े है यार. कल की बारिश के बाद आसमान पर छाई काली घटाए इससे अच्छा मौसम पतंग उड़ने के लिए हो ही नहीं सकता. कम्बखत एकदम रोमेंटिक है. बस कोई पकोड़े ले आये अदरक वाली चाय के साथ.



तभी पीछे से किसी सज्जन व्यक्ति ने माइक हाथ में लेकर जय कारा लगाया “ आई बो के लहराई ” इसका मतलब है काली माई ने कोई पतंग काटी है. उस सज्जन पुरुष का नाम असली में तो पाता नहीं पर हम उसे प्यार से “काली माई” बुलाते थे पूरे मोहोल्ले में सबसे पक्की मंजा वो ही लाता था पाता नहीं कहा अटलांटा से खरीदता था कम्बखत. इसी वजह से कोई उस से पेचा भी नहीं लेता. बल्कि वो ही "हवस के पुजारी की तरह अपनी पतंग औरो की पतंगों के पीछे लगा देता” अपने मोहोल्ले वाले तो उसकी पतंग आती देख अपनी पतंग उतार के रख लेते. और अगर उसकी पतंग कोई काट दे तो बस वो तब तक चैन से नहीं बैठता जब तक वो अपना बदला ना लेले. " पतंग का बदला पतंग से " 


घर की छत से दूर दिखाई देते वो पतंग लूटेरे बच्चे जो घात लगाये पतंग कटने का इन्जार कर रहे है. हाथ में लकड़ी लिए ये लूटेरे 2 से 3 गैंग में बटे होते. कभी कभी हालत इतने बिगड जाते है की जब पतंग दूसरे गैंग के पास जाती दिखे तो वो लकड़ी मार कर पतंग ही फाड़ देते है. और इस तरह की हरकत युद्ध की शुरुआत का आह्वान होती जिसे राह चलते कोई सज्जन भाईसाहब बंद करवाते. ये नटखट बच्चे अपनी भावनाएं जाहिर करने के लिए माँ-बहन से जुड़े कुछ सांस्कृतिक शब्दों का प्रयोग करते है. जिसे सुनकर राह चलते भाई साहब पूछ ही उठते है “कर भी लेगा”.


"जा टिंकू पतंग चरखी ले आ पर पहले लूटी हुई है वो ही लाइयो कही नई ले आये". मैं टिंकू को पतंग उड़ने का झांसा देकर हमेशा चरखी पकड़वाता फिर टिंकू ने दूर बनी उस दिवार पर जाकर दर्याई दे दी और इसी के साथ आनंद मिलता उस त्यौहार की जिसे तीज कहा जाता है. बीच बीच मैं टिंकू का मन बहलाने के लिए पतंग उड़ा कर थोड़ी देर को मांजा दे देता लेकिन जैसे ही पेचे होने वाले होते तो फिर छीन लेता. टिंकू की भी बिचारी किस्मत ही खराब थी पतंग कटने के बाद मांजा लपटेते लपेटते वो जिंदगी से निराश हो चला था. और मैं पतंग कटवाने के बाद पानी पीने भाग जाता ताकि मांजा ना लपेटना पड़े. और अगली पतंग फिर से हवाओ की पपिया लेने निकाल पड़ती.

सुबहे से मेहनत करके पतंग उड़ाते बच्चे सारी दोपहर सोते और आँख खुलते ही फिर पतंग चरखी हाथ में लिए छत पर रवाना.

काल्पनिक घटना 
एक बार छत पे पहुचते ही एक पतंग मिली जो छत पर कटी पड़ी थी. तो मैंने पतंग से पुछा 
"यार तेरे पीछे हम इक इक किलोमीटर तक भागते थे. भागते भागते चप्पल भी टूटवाई पर आज कैसे छत पर ही मिल गई" तब पतंग ने बड़े ही प्यार से जवाब दिया "मेरा टाइम चला गया दोस्त और जब किसी का टाइम चला जाता है तो उसे कोई नहीं पूछता आज किसी ने मुझे लकड़ी फसाकर लूटने की कोशिश नहीं की " 


सुबह 6 से 10 और शाम के 4 से 7 का समय बड़ा ही घनघोर और प्रचंड होता. स्पीकरो से निकलती आवाज़, घरो की छत पर खड़े बच्चे और उनके मम्मी पापा, और पतंगों का आना जाना एक ऐसी दुनिया में ले जाता जैसे होता है कोई सपना खुशहाल बस्ती दुनिया का.



अब ढलता सूरज ले जा रहा है ऐसे त्यौहार को जिसने बच्चो को याद करने के लिए बहुत सी यादे दी अगले साल आने के इंतज़ार के साथ पर अब लंबा अरसा हो गया है तबियत से तीज मनाए अब ना वो समय रहा है, ना वो लोग रहे है और ना ही वो हम रहे है. बदलते दौर ने सब बदल दिया आजकल फसबूक पर किसी पतंग की पोस्ट को लाईक करके ही तीज मना लेते है. पर फिर भी मुझे फक्र है 90 के दशक का बच्चा होने पर की ऊपर वाले ने सबसे ज़बरदस्त बचपन हमे ही दिया. पढने के लिए बोहोत बोहोत आभार.


हवा में प्रणाम - राम राम

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