Skip to main content

GURUDWARA SRI GURU SINGH SABHA




भईया एक चाय देना !!! और सड़क पर जाती गाडियों को फ़िल्मी अंदाज में देखते हुए चाय का आनंद लेना शुरू किया. सूरज भी थोडा गरमाया हुआ है. वैसे चाय पीना ठीक तो नहीं पर वही है ना हम भी नशेड़ी हो चले है इसके जब तक ये अंदर ना जाये तब तक हाथ पैर काम ही नहीं करते.

फिर अपनी साइकिल उठा हम निकल लिए रविवार की उन सुनसान सडको पर. खाली सड़के देख कर काफी खुशी सी होती है ऐसा लगता है जैसे मुदतो बाद कोई रेलवे फाटक खुला मिला हो. सड़क के साइड में लगे पेड और रहो में बीछे हुए फूल एकदम आनंद का अनुभव देते है जैसे ठहर जाता है समय किसी के इंतज़ार में. प्रकृति को गौर से निहारना भी एक कला है जो कभी जल्दी में नहीं की जा सकती.

रेड लाइट पर भीख मांगते लोगो को देख अक्सर भरमा जाता हूँ समझ नहीं आता ये सही में मजबूर है या फिर एक्टिंग ही इतनी जबरदस्त है. तभी पीछे से होर्न बजा “अरे चल रहा हूँ यार हवाई जहाज थोड़ी है”

मैं धीरे धीरे अपनी मंजिल के नजदीक पहुँच रहा था आसमान में लहराता वो केसरिया रंग का झंडा किसी शूरवीर की तरह हवाओ का सामना कर रहा है और अपनी शोभा बढ़ा रहा है. आस पास उगी गगनचुम्बी इमारतों के बीच दूर से दिखती ये सफ़ेद रंग की ईमारत यही मेरा ठिकाना है. गुरूद्वारे के साइड में बनी इस पार्किंग में अपनी लम्बोर्गिनी बड़ी शान से खड़ी कर दी.
 
इस गुरुद्वारे के इतिहास के बारे में मुझे कोई ज्यादा ज्ञान तो नहीं है ना ही सिख धर्म के बारे में कोई खास पता है. लेकिन यहाँ पहुँच कर काफी सुकून सा मिलता है. इसीलिए आ जाता हूँ कभी रविवार को की अपने पापों की माफ़ी मांगने.

पहुँचते ही बड़े सत्कार के साथ अपने जोड़े (जूते ) जोड़ा घर में जमा करा दिए. फिर पानी से मुंह और पैर धोकर सर पर रूमाल बांध लिया और आ पंहुचा मैं दरबार में. द्वार पर खड़े होकर दरबार को देखना बड़ा सुकून देय होता है. गुरुबाणी सुनने बैठी संगत भी अजब ही होती है हर तरह के लोग दिखाई पड़ते है. कुछ भाई वही मोबाइल वाली बीमारी से पीड़ित लगे रहते है ऊँगली स्क्रीन पर मरने में और कोने में बैठे अंकल जी शायद अपने जवानी के दिन याद कर रहे हो. चश्मे वाली दादी अपने पौते को खिला रही है शायद पौती भी हो सकती है पता नहीं. साइड में बैठे बड़े वीर जी ही मुझे घनी भक्ति में लीन लगे. और मैं ये सब देखने के बाद करता हूँ कंसन्ट्रेट भगवान में.

गुरुद्वारा आने पर बड़ी शांति सी मिलती है साफ़, सफाई और दरबार सभी तो मस्त होता है और गुरुबाणी की मध्यम मध्यम ध्वनि दिल की अनंत गहराइयों में उतारकर दिल को साफ़ करने का काम करती है. और दिमाग में मच्छरों की तरह आते ख्याल ऐसे शांत हो जाते है जैसे अभी मच्छर मरने वाले बैट से मारा हो. 



जितना ध्यान हो सका किया और फिर मत्था टेक कर हलवे का प्रसाद लिया. प्रसाद अच्छा लगा मन तो कर रहा था एक बार फिर मांग लू पर वो ही है ना मुझे भी शर्म सी आती है


फिर अरदास के बाद में अपन पहुंचे नीचे बनी रसोई में तक़रीबन 12 बजे का वक़्त हो गया था और लोग सेवा देने के लिए आ चले थे. सेवा में अक्सर कहा नहीं जाता की आप कुछ करो या न करो सब आप के ऊपर है आप जाकर सेवा दे सकते है या लंगर मिलने तक बैठ के इंतजार कर सकते है. अरे जल्दी जल्दी में मैंने बताया ही नहीं भाई सेवा का मतलब ये नहीं है के आपको किसी के हाथ पैर दबाने है या किसी के सर में मालिश करनी है चलो बतात हूँ सेवा के प्रकार. पर एक मिनट थोडा निम्बू पानी पी लू बड़े बोहोत काम करके आया हूँ न में जैसे. इक बात माननी पड़ेगी की साफ सफाई में कोई कोम्प्रोमाईज़ नहीं था यहाँ सब एकदम साफ़. 

हाँ तो सेवा अक्सर तन – मन – धन से की जाती है


तो रसोई घर में होने वाली सेवा अक्सर तन की सेवा होती है जैसे
सब्जी काटना

रोटी बनवाना

सब्जी बनवाना

इस्तेमाल बर्तन धोना

रोटियों के घी लगाना

और भी कई प्रकार से 


लंगर बनाते टाइम कोने वाले स्पीकरो से आती गुरबाणी की आवाज़ माहौल को एकदम अध्यात्मिक बना देती है. लोगो को सेवा करते देखना और खुद भी हाथ बटाना किसी कामचोर इन्सान के लिए इतना आरामदायक होगा ये सोचा भी नहीं था. रसोई में सेवको की आवाजाही लगी रहती है कोई बाल्टी, कोई प्लेट, कोई सब्जी, कोई कुछ और कोई बिना कुछ ही इधर उधर आते जाते देखे जा सकते है.

शुरुआत में मैं आटे की रोटी गोल करने के लिए गया पर वहा जब मैंने अपने बनाये नक़्शे देखे तो मुझे लगा मैं इससे भी अच्छा कर सकता हूँ फिर अपन चुपचाप कोने में खड़े होकर रोटियों के घी लगा रहा थे. अपनी तो पांचो उंगलिया घी में थी. तभी मेरी घी लगाने के कौशल से प्रभावित होकर एक भाई ने पूछा कैसे करना है भाई... मैंने भी बड़ी सज्जनता से कहा “ दो रोटी उठाओ घी लगाओ और फिर दो रोटी उठाओ घी लगाओ “ हाहाहा....☺☺☺


खाना बनाने का सिलसिला दोपहर 12 बजे से जोर पकड़ता है और तक़रीबन शाम तक चलता रहता है. लेकिन पहला लंगर दोपहर 2 बजे परोसा जाता है. और भरी मात्र में लोग आपको पहली बारी में दिखाई देते है लेकिन एक बात जो मुझे बहुत अच्छी लगी मतलब बहोत ही अच्छी लगी की किसी भी सेवक में आप गुरुर का भाव नहीं पायंगे बल्कि इतनी सेवा का भाव दिखेगा की वो आपको “वाहेगुरु” के नाम से संबोधित करते है. हो सकता है की गुरूद्वारे से बहार निकलते ही वो आपको माँ-बहन करे लेकिन अंदर बड़े ही सत्कार से वाहेगुरु ही कहेंगे. इतनी शालीनता आज कल हजम नहीं हो पाती अपने तो.





जब लंगर बटने के लिए सेवक इकठे होते है तो ठीक उसी तरह की छोटी सी प्लानिंग होती है जैसे क्रिकेट मैच शुरू होने से पहले खिलाडी लोग करते है तो में भी उस टीम का हिस्सा था तो हमारी टीम के कप्तान “ नाम पता नहीं “ जी कहते है. “ वाहेगुरु जी सेवा में टाइम लग जायगा और जब तक सारी संगत नहीं खा लेती तब तक जाना नहीं वाहेगुरु जी अगर आपको भूख है तो पहले खा लीजिये पर बीच में मत जाना वहेगुरुजी विनती है “

और उसके बाद सेवको में ठीक उसी फुर्ती से काम करते है जैसे फार्मूला 1 कार रेस में पिट स्टॉप पे लोग टायर बदलते है. कोई प्लेट, कोई सब्ज, कोई दाल, कोई चावल, कोई सलाद, कोई रोटी, कोई खीर, कोई पानी लिए संगत में लंगर बाटते है जो बिना किसी एहम भाव के होता है. “ वाहेगुरु प्रसादा “ वाहेगुरु खीर “ वाहेगुरु चावल “ इस तरह के शब्द आपको निरंतर सुनते रहेंगे. और प्रसाद खाने के बाद आप अपने इस्तेमाल बर्तन धुलने के लिए दे सकते है और अगर आप चाहे तो आप भी बर्तन धुलवाने के लिए अपना हाथ बट्टा सकते है.
 


एक बार फिर से दरबार दर्शन करके टोकन हाथ में लिए में जोड़ा घर जा पहुंचा शाम के 4 बज चुके थे. सूरज भी जाने के लिए जूते पेहेन रहा था. फिर अपन पार्किंग पहुंचे और अपनी लम्बोर्गिनी की सीट हाथ मारकर साफ़ की और जेब में रुमाल के नीचे धसी लीड ( ईयरफ़ोन ) निकली और कान में ठूस ली. और फिर से दरबार की तरफ देख भूल चूक माफ़ नतमस्तक किया और गाना बजाया.

“कड़े तेरी फुलकारी साड्डी जान नि तू फुलकारी कढ दी''

और इसी के साथ में लुप्त हो गया ट्रैफिक के उन गाडियों में जो ढलती शाम के साथ अपने घर को लौट रही थी.
बस इतना सा था आज का दौरा कभी आप ही जाना गुरूद्वारे टाइम निकाल कर अच्छा लगता है  
 हवा में प्रणाम

Comments

Popular posts from this blog

अलविदा अम्मा

कल रात से ही माहौल गरमाया हुआ था और लोग हॉस्पिटल के सामने, सडको पर और जंहा जगह मिल जाये वंही भगवान को मानाने में लगे हुए थे. पर इस बार ऐसा लग रहा था की भगवान नहीं मानेंगे मगर लोग तो बिचारे भोले भाले होते है.
आज सुबहे 5 बजे अलार्म बजा तो देखा की टीवी चल रहा है और साथ वाले पलंग पर लेटे लातिश भाई बोले “ AMMA NO MORE YAAR”. मुझे लगा की लातिश भाई भी अम्मा के हार्डकोर फैन है. वैसे भी अपन को या कहे की सभी को पहले से ही आईडिया हो गया था की ज्यादा टाइम है नहीं अम्मा के पास. आज सारा दिन चर्चा का मुद्दा रही अम्मा टीवी, लोग, सड़क जहा देखो अम्मा ही अम्मा हो रही थी. मुझे तमिल नाडू का राजनीती तंत्र अजीब या कहे व्यक्ति केन्द्रित लगता है यहाँ के लोग राजनेताओ को भगवान का दर्जा देते है. नेताओ द्वारा अम्मा के पैर छूने की बात तो जग जाहिर है. कहा जाता है की शादी के टाइम लोग जयललिता जी की बड़ी सी मूर्ति आशीर्वाद देते हुए लगते है जिसमे हाथो से अम्मा फूल बरसाती है. मतलब अम्मा को भगवान का दर्जा है.


कुछ लोगो के साथ हुई बाते आप लोगो से साझा करता हूँ ये लोग तमिल नाडू के निवासी या वंहा से तालुक रखते है: 
अम्मा ने गरीबो …

Life @ MRK

इस पोस्ट का मकसद किसी भी तरह से कॉलेज की प्रशंसा या बुराई करना नहीं है. ये पूर्ण रूप से व्यक्तिगत विचार है अगर ये विचार किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु के विचारों से मेल खाते है तो उसे महज संयोग और मेरा दोस्त कहा जायगा.
हरियाणा के दक्षिण में बसे शहर रेवाड़ी से 7 किलोमीटर दूर खेतो के बीचो बीच उगे इस कॉलेज को “ MATA RAJ KAUR INSTITUTE OF ENGINEERING & TECHNOLOGY “ नाम से जाना जाता है.बनावट के हिसाब से ठीक ठाक ज़बरदस्त, स्टाफ के हिसाब से भी कुल मिला के बढ़िया. सुविधाओं के लिहाज से अच्छा कहा जा सकता है. खेतो के बीच में बसे होने के कारण लडको को कॉलेज से फरार होकर पिक्चर देखने जाने में काफी परेशानी उठानी पड़ती है. कभी कभी तो कॉलेज से भागे लड़के ऑटो ना मिलने की वजह से वापिस कॉलेज ही आ जाते है. कॉलेज की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा हरयाणा के बहार के लौंडो का भी होता है. जो थोड़े दिन में हरयाणवी बोलते देखे जा सकते है. अब काफी लोगों के मन में सवाल आया होगा की लड़कियाँ कैसी है भाई तो अपना जवाब है जैसा देखने वाला देखे. बाकि अपन को तो कोई खास लगी नहीं.


अब सब सोच रहे होंगे के ये सब क्यों बताया जा रहा है तो लिजीये …

A PHOTOGRAPHIC VISIT TO HARYANVI CULTURE

शहीद

शहीद PDF 



वो रोज धमाके सुनते है
जीते हैं जंग के साये में
वो खडे हुए हैं सीमा पर
ले असला अपनी बाहों में

गोलियों की बरसात में
वो लाल लहू से नहाते हैं
होली हो या दिवाली हो
सब सीमा पर ही मनाते हैं

इक आस जो घर पर जाने की
जो पल भर में धुल जाती है
सीमा पार से आकर गोली
साथी को डंस जाती है

फिर कहते हैं इस हालत में
हम घर को जा सकते नहीं
सर कटा सकते हैं लेकिन
सर झुका सकते नहीं
फिर खून खौल सा जाता है
रह रह कर गुस्सा आता है
वो घुंट लहू का पीते हैं
मर मर कर फिर भी जीते हैं

इस वतन चमन के खातिर
अपनी जान देश पर वार गए
खाकर गोली सीने पर वो
सीधे स्वर्ग सीधार गए

सजा तिरंगे में अर्थी‎ जब
घर पर लाई जाती है
याद करा कर कुर्बानी
गोलियां चलाई जाती हैं

सरकारी दलाल भी आते हैं
शहादत गिनाई जाती है
लाख रुपे का चैक दिखा कर
फोटो खिचवाई जाती है

बस इतना सा ये किस्सा है
बस इतनी सी ये कहानी है
ना इनका कोई बुढ़ापा है

सलाम ना आया

सलाम ना आया (PDF)




थी गुफ़्तगू इक आने के उसकी ढल चला आफताब पर पैगाम ना आया
चढ़ा था सुरूर मय खाने में थे हम पर सदियों से प्यासों का वो “जाम” ना आया
खड़े थे कुचे में इक झलक ऐ दीदार को वो आये नज़र मिली पर सलाम ना आया
मिली बदनामिया और मिली शौहरते पर हसरतों वाला दिली मुकाम ना आया
उसका था शहर और उसकी अदालते हम हुए हलाक उसे इल्जाम ना आया
“दीप” हुआ बदनाम सारे इस जंहा में  पर उस बेवफा का कही नाम ना आया
प्रदीप सोनी 

IAS सोनू

रात का वक्त हो चला है. डिम रोशनी में जलते उसबल्ब को देखता सोनू भयंकर सोच में है. अब शायद रिश्ता साजुड़ चला है उस जीरोवाट केबल्ब के साथ. ना जाने कितनी ही रात उसने उस बल्ब के साथ बातें की हैं.



आज शुरू होते ही खत्म हो जाने वाले इस कमरे में पूरे 2 साल हो चुके हैं. 2 साल हो चले हैं एक उम्मीद को पालते हुए. और हो चले हैं 2 साल इक सपने को जीते जीते.आज बात हो रही हैबल्ब सेकि किस कदर बीते हैं 2 साल.अब भी याद है जब वहउम्मीदों की पोटलीलिए दिल्ली आया था. चेहरे पर लाली और जुल्फें एकदम तेरे नाम के राधे भैया जैसी. पर अब 2 साल बाद राधे भईया वाली जुल्फे मनीष सिसोदिया के बालों में बदल चुकी हैं. 2 साल पहले वाला बाका सोनू हिंदी फिल्मो वाला लाला बन चुका है.पेट आ गयाहै सोनू को.
घर से आती उम्मीदों वाले फोन पर जब पूछा जाता कि बेटा पढ़ाई कैसे चल रही है. तो एक क्षण को सोचकर सोनू बोलता पढ़ाई तो अच्छी चल रही है माँ पर टाइम का नहीं मालूम कैसा चल रहा है.
जब छोटी बहन बोलती है कि " भैया इस राखी पर मुझे आप की लाल बत्ती वाली गाड़ी चाहिए ". फिर भी सोनू खामोशी से दबी आवाज़ में “हां” कर देता है.

पिता जी से अक्सर बात…

मेरे गुरु है नमन तुम्हे

दूर तलक था अँधियारा
जब जीवन का आगाज हुआ

अनजाना सफ़र अनजानी डगर
मकसद जीवन का राज हुआ

जो मिले आप तो मिला साथ
किसी धुन का जैसे साज हुआ

इस ज्ञान डगर पर चलने से
मुझे जीने का अंदाज हुआ

बन दीप गुरु जब आप जले
तो रोशन ये संसार हुआ

हे मेरे गुरु है नमन तुम्हें
मेरा धन्य जीवन आज हुआ


प्रदीप सोनी

पेपर और धक्के

सर्दियों ने भी जुल्म किया हुआ है कम्बखत दिन निकल कर कब रात हो जाती है अँधेरे अँधेरे में कुछ पता ही नहीं लगता ऊपर से पेपर की चिंता अलग. बिलकुल ऐसा लगता है जैसे बर्फ की सिल्ली पर लेटकर बेल्ट मारी जा रही हो. वो तो सभी को पता ही है कहा मारी जाती है. यार कल सुबह पेपर है और पढ़ा भी कुछ नहीं और उससे भी बड़ी टेंशन कल पेपर के टाइम तक कॉलेज पहुंचेगे भी या किसी मोड़ पे खड़े होकर लिफ्ट मांगते घूमेंगे. कोहरे की वजह से बस लेट हो जाये, आँख ना खुला और सौ बात. इन्ही खयालो ने ही मुझे और टीटू को 10 मिनट के अन्दर बस स्टैंड पंहुचा दिया. मैं और टीटू हाथ में झोला लिए बस स्टैंड पे झज्जर वाली बस के सामनेखड़े थे. तो भाई मौसम बड़ा ही सुहाना सा था एकदम आसमान काली घटाओ से घिरा हुआ मंद मंद सर्दी. बोले तो सेक्सी मौसम. हिंदी फिल्मो में जिसे बेईमान मौसम कहा जाता है. “ सीटी बजी “ "चलो भाई सारे बैठ लो चल पड़ी बस." अब भईया अपनी बसों में ये रुल था की अगर बस के अन्दर बैठ के गए तो 25 रुपे किराया और छत पर बैठ कर गए तो 15 रुपे किराया. तब मैंने और टीटू ने दिमाग लगाया की छत पर ही चलते है यार 10 – 10 रुपे बचेंगे उतर के समोसे ख…

भारतीय माँ के हथियार

भारतीय माँ के हथियार