GURUDWARA SRI GURU SINGH SABHA

May 17, 2017




भईया एक चाय देना !!! और सड़क पर जाती गाडियों को फ़िल्मी अंदाज में देखते हुए चाय का आनंद लेना शुरू किया. सूरज भी थोडा गरमाया हुआ है. वैसे चाय पीना ठीक तो नहीं पर वही है ना हम भी नशेड़ी हो चले है इसके जब तक ये अंदर ना जाये तब तक हाथ पैर काम ही नहीं करते.

फिर अपनी साइकिल उठा हम निकल लिए रविवार की उन सुनसान सडको पर. खाली सड़के देख कर काफी खुशी सी होती है ऐसा लगता है जैसे मुदतो बाद कोई रेलवे फाटक खुला मिला हो. सड़क के साइड में लगे पेड और रहो में बीछे हुए फूल एकदम आनंद का अनुभव देते है जैसे ठहर जाता है समय किसी के इंतज़ार में. प्रकृति को गौर से निहारना भी एक कला है जो कभी जल्दी में नहीं की जा सकती.

रेड लाइट पर भीख मांगते लोगो को देख अक्सर भरमा जाता हूँ समझ नहीं आता ये सही में मजबूर है या फिर एक्टिंग ही इतनी जबरदस्त है. तभी पीछे से होर्न बजा “अरे चल रहा हूँ यार हवाई जहाज थोड़ी है”

मैं धीरे धीरे अपनी मंजिल के नजदीक पहुँच रहा था आसमान में लहराता वो केसरिया रंग का झंडा किसी शूरवीर की तरह हवाओ का सामना कर रहा है और अपनी शोभा बढ़ा रहा है. आस पास उगी गगनचुम्बी इमारतों के बीच दूर से दिखती ये सफ़ेद रंग की ईमारत यही मेरा ठिकाना है. गुरूद्वारे के साइड में बनी इस पार्किंग में अपनी लम्बोर्गिनी बड़ी शान से खड़ी कर दी.
 
इस गुरुद्वारे के इतिहास के बारे में मुझे कोई ज्यादा ज्ञान तो नहीं है ना ही सिख धर्म के बारे में कोई खास पता है. लेकिन यहाँ पहुँच कर काफी सुकून सा मिलता है. इसीलिए आ जाता हूँ कभी रविवार को की अपने पापों की माफ़ी मांगने.

पहुँचते ही बड़े सत्कार के साथ अपने जोड़े (जूते ) जोड़ा घर में जमा करा दिए. फिर पानी से मुंह और पैर धोकर सर पर रूमाल बांध लिया और आ पंहुचा मैं दरबार में. द्वार पर खड़े होकर दरबार को देखना बड़ा सुकून देय होता है. गुरुबाणी सुनने बैठी संगत भी अजब ही होती है हर तरह के लोग दिखाई पड़ते है. कुछ भाई वही मोबाइल वाली बीमारी से पीड़ित लगे रहते है ऊँगली स्क्रीन पर मरने में और कोने में बैठे अंकल जी शायद अपने जवानी के दिन याद कर रहे हो. चश्मे वाली दादी अपने पौते को खिला रही है शायद पौती भी हो सकती है पता नहीं. साइड में बैठे बड़े वीर जी ही मुझे घनी भक्ति में लीन लगे. और मैं ये सब देखने के बाद करता हूँ कंसन्ट्रेट भगवान में.

गुरुद्वारा आने पर बड़ी शांति सी मिलती है साफ़, सफाई और दरबार सभी तो मस्त होता है और गुरुबाणी की मध्यम मध्यम ध्वनि दिल की अनंत गहराइयों में उतारकर दिल को साफ़ करने का काम करती है. और दिमाग में मच्छरों की तरह आते ख्याल ऐसे शांत हो जाते है जैसे अभी मच्छर मरने वाले बैट से मारा हो. 



जितना ध्यान हो सका किया और फिर मत्था टेक कर हलवे का प्रसाद लिया. प्रसाद अच्छा लगा मन तो कर रहा था एक बार फिर मांग लू पर वो ही है ना मुझे भी शर्म सी आती है


फिर अरदास के बाद में अपन पहुंचे नीचे बनी रसोई में तक़रीबन 12 बजे का वक़्त हो गया था और लोग सेवा देने के लिए आ चले थे. सेवा में अक्सर कहा नहीं जाता की आप कुछ करो या न करो सब आप के ऊपर है आप जाकर सेवा दे सकते है या लंगर मिलने तक बैठ के इंतजार कर सकते है. अरे जल्दी जल्दी में मैंने बताया ही नहीं भाई सेवा का मतलब ये नहीं है के आपको किसी के हाथ पैर दबाने है या किसी के सर में मालिश करनी है चलो बतात हूँ सेवा के प्रकार. पर एक मिनट थोडा निम्बू पानी पी लू बड़े बोहोत काम करके आया हूँ न में जैसे. इक बात माननी पड़ेगी की साफ सफाई में कोई कोम्प्रोमाईज़ नहीं था यहाँ सब एकदम साफ़. 

हाँ तो सेवा अक्सर तन – मन – धन से की जाती है


तो रसोई घर में होने वाली सेवा अक्सर तन की सेवा होती है जैसे
सब्जी काटना

रोटी बनवाना

सब्जी बनवाना

इस्तेमाल बर्तन धोना

रोटियों के घी लगाना

और भी कई प्रकार से 


लंगर बनाते टाइम कोने वाले स्पीकरो से आती गुरबाणी की आवाज़ माहौल को एकदम अध्यात्मिक बना देती है. लोगो को सेवा करते देखना और खुद भी हाथ बटाना किसी कामचोर इन्सान के लिए इतना आरामदायक होगा ये सोचा भी नहीं था. रसोई में सेवको की आवाजाही लगी रहती है कोई बाल्टी, कोई प्लेट, कोई सब्जी, कोई कुछ और कोई बिना कुछ ही इधर उधर आते जाते देखे जा सकते है.

शुरुआत में मैं आटे की रोटी गोल करने के लिए गया पर वहा जब मैंने अपने बनाये नक़्शे देखे तो मुझे लगा मैं इससे भी अच्छा कर सकता हूँ फिर अपन चुपचाप कोने में खड़े होकर रोटियों के घी लगा रहा थे. अपनी तो पांचो उंगलिया घी में थी. तभी मेरी घी लगाने के कौशल से प्रभावित होकर एक भाई ने पूछा कैसे करना है भाई... मैंने भी बड़ी सज्जनता से कहा “ दो रोटी उठाओ घी लगाओ और फिर दो रोटी उठाओ घी लगाओ “ हाहाहा....☺☺☺


खाना बनाने का सिलसिला दोपहर 12 बजे से जोर पकड़ता है और तक़रीबन शाम तक चलता रहता है. लेकिन पहला लंगर दोपहर 2 बजे परोसा जाता है. और भरी मात्र में लोग आपको पहली बारी में दिखाई देते है लेकिन एक बात जो मुझे बहुत अच्छी लगी मतलब बहोत ही अच्छी लगी की किसी भी सेवक में आप गुरुर का भाव नहीं पायंगे बल्कि इतनी सेवा का भाव दिखेगा की वो आपको “वाहेगुरु” के नाम से संबोधित करते है. हो सकता है की गुरूद्वारे से बहार निकलते ही वो आपको माँ-बहन करे लेकिन अंदर बड़े ही सत्कार से वाहेगुरु ही कहेंगे. इतनी शालीनता आज कल हजम नहीं हो पाती अपने तो.





जब लंगर बटने के लिए सेवक इकठे होते है तो ठीक उसी तरह की छोटी सी प्लानिंग होती है जैसे क्रिकेट मैच शुरू होने से पहले खिलाडी लोग करते है तो में भी उस टीम का हिस्सा था तो हमारी टीम के कप्तान “ नाम पता नहीं “ जी कहते है. “ वाहेगुरु जी सेवा में टाइम लग जायगा और जब तक सारी संगत नहीं खा लेती तब तक जाना नहीं वाहेगुरु जी अगर आपको भूख है तो पहले खा लीजिये पर बीच में मत जाना वहेगुरुजी विनती है “

और उसके बाद सेवको में ठीक उसी फुर्ती से काम करते है जैसे फार्मूला 1 कार रेस में पिट स्टॉप पे लोग टायर बदलते है. कोई प्लेट, कोई सब्ज, कोई दाल, कोई चावल, कोई सलाद, कोई रोटी, कोई खीर, कोई पानी लिए संगत में लंगर बाटते है जो बिना किसी एहम भाव के होता है. “ वाहेगुरु प्रसादा “ वाहेगुरु खीर “ वाहेगुरु चावल “ इस तरह के शब्द आपको निरंतर सुनते रहेंगे. और प्रसाद खाने के बाद आप अपने इस्तेमाल बर्तन धुलने के लिए दे सकते है और अगर आप चाहे तो आप भी बर्तन धुलवाने के लिए अपना हाथ बट्टा सकते है.
 


एक बार फिर से दरबार दर्शन करके टोकन हाथ में लिए में जोड़ा घर जा पहुंचा शाम के 4 बज चुके थे. सूरज भी जाने के लिए जूते पेहेन रहा था. फिर अपन पार्किंग पहुंचे और अपनी लम्बोर्गिनी की सीट हाथ मारकर साफ़ की और जेब में रुमाल के नीचे धसी लीड ( ईयरफ़ोन ) निकली और कान में ठूस ली. और फिर से दरबार की तरफ देख भूल चूक माफ़ नतमस्तक किया और गाना बजाया.

“कड़े तेरी फुलकारी साड्डी जान नि तू फुलकारी कढ दी''

और इसी के साथ में लुप्त हो गया ट्रैफिक के उन गाडियों में जो ढलती शाम के साथ अपने घर को लौट रही थी.
बस इतना सा था आज का दौरा कभी आप ही जाना गुरूद्वारे टाइम निकाल कर अच्छा लगता है  
 हवा में प्रणाम

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