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Showing posts from July, 2017

लेपाक्षी ( हिन्दूपुर )

बेंगलुरु से लेपाक्षी जाने के लिए आपको एअरपोर्ट रोड से अनंतपुर की तरफ जाना होगा. राष्ट्रीय राजमार्ग होने के कारण आपको किसी प्रकार की दिक्कत तो नहीं होगी मगर आप दिल या जेब से कमजोर है तो मन भारी करके दो बार टोल टैक्स भर दे. बस और बाइक से जाने वाले चिंता ना करे.

बेंगलुरु से तक़रीबन 110 किलोमीटर दूर आंध्र प्रदेश के हिन्दुपुर जिले में स्तिथ इस छोटे मगर प्राचीन शिव मंदिर को लेपाक्षी मंदिर के नाम से जाना जाता है. दक्षिण भारत के अन्य मंदिरों के तरह इसे भी पत्थरों पर शानदार तरीके से तराशा गया है.

यहाँ पहुँचने पर हमे भीड़ तो कोई ख़ास नहीं दिखी. वहा ठीक उसी प्रकार के श्रद्धालुओं का ताता था जैसे की हम घुमने आये थे फोटो खीचने-खिचाने.

 किसी भाई ने बताया की यहाँ लोगो को आना जाना कम ही रहता है कारण है इसका गाँव में स्तिथ होना और ऊपर से टूरिस्ट विभाग की तरफ से भी अनदेखी. मंदिर में प्रवेश करते ही आपको सामने भगवान की मूर्ति दिखी. 

''मंदिर का इतिहास जानने के लिए कृपया गूगल बाबा से पूछ ले.  हम तो मोटा मोटा हिसाब रखते है. शिव मंदिर है और जय भोले की.''



करनी का फल

वो दोनों साइड टायर लगी एक्टिवा दुकान के सामने आकर खड़ी हुई. उन भाई साहब को टायर बदलवाना था. वो अपने हाथ में छड़ी का सहारा लेकर आये और मेरे पास बैठ गए. छोटू भी टायर डालने लगा
तब उसने बातचीत शुरू हुई और बातचीत तक़रीबन 1 घंटा चली. और बड़े दिल से उन्होंने एक एक बात बताई जो की कुल मिला कर ये थी.
“ भाई मैं टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च से पढ़ा हूँ. यहाँ पड़ोस में मेरा गाँव है. पहले मैं दिखने में भी लम्बा चौड़ा गबरू था. स्टेट लेवल बॉक्सिंग खेल चूका हूँ. पढाई में भी हमेशा फर्स्ट आया करता. किसी को मैं अपने बराबर नहीं समझता. एक लड़की थी हमारे TIFR बैच में बहुत परेशान किया उसको. वो हमेशा मुझे बदुआ दिया करती थी. पढाई के बाद मैंने अपना काम शुरू किया और महीने का लाखो रुपे कमाने लगा. अपने साथ काम करने वालो को भी कुछ नहीं समझता सब मेरे लिए बदुआ मांगते थे. और छोटे भाई आज 2 साल हो चुके है मैं बिना छड़ी के चल नहीं सकता और डॉक्टर कह रहे है ठीक होने में और 3 साल लगेंगे और मुझे पता है मैं पहले जैसा कभी नहीं हो पाउँगा. मुझे पता है भाई ये मेरे कर्मो की सजा मिल रही है. घमंड बहोत था मुझे अपने ऊपर” 
उन्होंने जाते टा…

फूटबाल

“इस फूटबाल को फोड़ दूंगी ना तो बहार जा कर खेल लिया कर तू यहाँ घडी मटका फोड़ेगा”माँ ने मोनू को कहा और बाजार जाने लगी.
“बस ये आखरी किक फिर जाता हूँ”मोनू ने फ़रमाया
पर घर में रोनाल्डो बनने का मजा ही कुछ और है और इसी के साथ मोनू ने सामने बिछी खाट को गोल बना कर फूटबाल पर जोरदार लात धर दी.
और वो फूटबाल सीधा जाकर खाट के पाए ( पैर ) से टकराई और सीधे मटके की तरफ रवाना और उसके साथ ही मटका फिनिश.
जैसे ही बाल मटके से टकराई मैं कमरे से बरामदे की देहलीज पर.
अब कुछ इस तरह का बरमूडा ट्रायंगल था: माँ के हाथ में बाजार के लिए थैला
मोनू ने अभी अभी मटका फोड़ा
और अपन बरामदे और कमरे की देहलीज पर खड़े है.
मैंने जैसे ही वापिस कमरे में जाने की कोशिश की...
“दोनों जने इधर आओ” माँ ने हाथ में चप्पल लिए पुकारा 
आगे आप खुद ही समझदार हो. 
हवा में प्रणाम

10 रुपे

उस दिन बैंक जाते हुए वो आदमी कुछ देखा देखा सा लगा फिर बाद में समझ आया अरे ये तो वही भाई है जो हमारे पड़ोस में स्कूटर ठीक किया करता था.
उसके पास एक एटलस की पुरानी साइकिल थी और पीछे एक छोटी बच्ची बैठी हुई थी शायद साइकिल का पिछला टायर पंचर था.
वो बड़ी उत्सुकता से पास आया और हाल पूछने लगा.
“और भैया कैसे हो"
हालंकि में उम्र में उनसे बहुत छोटा था. “मैंने कहा बढ़िया भैया आप बताओ कहा आजकल...???”
उसने कहा “ भाई गाँव जा रहा था साइकिल पंचर हो गयी 10 रुपे देदे बाद में दुकान आ के दे दूंगा “
और उस दिन वाकई किस्मत ऐसी की 500 से छोटा नोट नहीं जेब में...

मैंने कहा “भाई रुपे तो नहीं है”
उसने फिर कहा “दे दे भाई वापिस दे दूंगा”
लेकिन मेरे पास सही में खुले नहीं थे
मैंने कहा “भाई सही में नहीं है”
फिर उसने बड़े उदास दिल से कहा “चल कोई बात नहीं भाई” ( आज भी जब उसकी आँख में दिखी मायूसी सोचता हूँ तो कसम से दिल सहम जाता है )
और वो साइकिल पैदल लेकर जाने लगा और छोटी बच्ची पीछे बैठी हुई थी.
और उसे इस तरह जाता देख कर सच में दिल मायूस हो गया था. और मैं यही सोचने लगा काश मैंने वो गन्ने का जूस ना पिया होता.

नृत्याग्राम ( बेंगलुरु )

दिन:रविवार मौसम: बादलछाएथेपरसूरजकाछुपछुपकरहमलाजारीथा. जगह: नृत्याग्राम  ( बेंगलुरु )
रातके10बजेनृत्याग्रामजानेकाप्लानबनायेजानेकेबादमैंऔरडॉक्टरसाहबसुबहे9बजेमिलेऔरजानेकेलिएकैबढूँढनेलगे. परइतनीदूरजानेकेलिएउबरऔरओलादोनोंनेहाथउठादिएफिरहमनिकले