10 रुपे




उस दिन बैंक जाते हुए वो आदमी कुछ देखा देखा सा लगा फिर बाद में समझ आया अरे ये तो वही भाई है जो हमारे पड़ोस में स्कूटर ठीक किया करता था.

उसके पास एक एटलस की पुरानी साइकिल थी और पीछे एक छोटी बच्ची बैठी हुई थी शायद साइकिल का पिछला टायर पंचर था.

वो बड़ी उत्सुकता से पास आया और हाल पूछने लगा.

“और भैया कैसे हो"

हालंकि में उम्र में उनसे बहुत छोटा था. “मैंने कहा बढ़िया भैया आप बताओ कहा आजकल...???”

उसने कहा “ भाई गाँव जा रहा था साइकिल पंचर हो गयी 10 रुपे देदे बाद में दुकान आ के दे दूंगा “

और उस दिन वाकई किस्मत ऐसी की 500 से छोटा नोट नहीं जेब में...


मैंने कहा “भाई रुपे तो नहीं है”

उसने फिर कहा “दे दे भाई वापिस दे दूंगा”

लेकिन मेरे पास सही में खुले नहीं थे

मैंने कहा “भाई सही में नहीं है”

फिर उसने बड़े उदास दिल से कहा “चल कोई बात नहीं भाई”
( आज भी जब उसकी आँख में दिखी मायूसी सोचता हूँ तो कसम से दिल सहम जाता है )

और वो साइकिल पैदल लेकर जाने लगा और छोटी बच्ची पीछे बैठी हुई थी.

और उसे इस तरह जाता देख कर सच में दिल मायूस हो गया था. और मैं यही सोचने लगा काश मैंने वो गन्ने का जूस ना पिया होता.

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