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लेपाक्षी ( हिन्दूपुर )


बेंगलुरु से लेपाक्षी जाने के लिए आपको एअरपोर्ट रोड से अनंतपुर की तरफ जाना होगा. राष्ट्रीय राजमार्ग होने के कारण आपको किसी प्रकार की दिक्कत तो नहीं होगी मगर आप दिल या जेब से कमजोर है तो मन भारी करके दो बार टोल टैक्स भर दे. बस और बाइक से जाने वाले चिंता ना करे.


बेंगलुरु से तक़रीबन 110 किलोमीटर दूर आंध्र प्रदेश के हिन्दुपुर जिले में स्तिथ इस छोटे मगर प्राचीन शिव मंदिर को लेपाक्षी मंदिर के नाम से जाना जाता है. दक्षिण भारत के अन्य मंदिरों के तरह इसे भी पत्थरों पर शानदार तरीके से तराशा गया है.


यहाँ पहुँचने पर हमे भीड़ तो कोई ख़ास नहीं दिखी. वहा ठीक उसी प्रकार के श्रद्धालुओं का ताता था जैसे की हम घुमने आये थे फोटो खीचने-खिचाने.


 किसी भाई ने बताया की यहाँ लोगो को आना जाना कम ही रहता है कारण है इसका गाँव में स्तिथ होना और ऊपर से टूरिस्ट विभाग की तरफ से भी अनदेखी. मंदिर में प्रवेश करते ही आपको सामने भगवान की मूर्ति दिखी. 


''मंदिर का इतिहास जानने के लिए कृपया गूगल बाबा से पूछ ले. 
हम तो मोटा मोटा हिसाब रखते है. शिव मंदिर है और जय भोले की.''




मंदिर का स्वरुप पुरे तरीके से पहाड़ पर तराशा गया है. जो की अपने आप में बेहतरीन शिल्पकारी का जीता जगता नमूना है. आजकल वाले कलाकारों से नहीं बनने वाले ऐसे डिजाईन. लिखवा के ले लो. मंदिर के पीछे बना भगवान् शिव का विशाल शिवलिंग और उसपर नाग देवता की छाया अपने आप में शिल्पकारी का बहतरीन नजराना है. शुद्ध हिंदी ज्यादा तो नहीं हो रही ना.... ???

 
भगवान माफ़ करे मगर ईमानदारी से मंदिर पौराणिक मंदिर होने की बजाये एक टूरिस्ट स्पॉट ज्यादा लगता है. हम जैसे लोग यहाँ केवल फोटो खिचाने आते है जैसा की यहाँ दिखाई दे रहा था. साथ आये भाई ने बताया आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा अपने स्कूल पाठ्यक्रम में इस मंदिर पर पाठ भी पढाया जाता है.


मंदिर में दर्शन के बाद के बाद हम लोग खाने का जुगाड़ देखने लगे. तभी पास में बनी नंदी की शिला दिखाई दी. कहा जाता है ये नंदी शिवलिंग से सीधी दिखाई देती थी. जो अब लोगो के घर और मंजिल निर्माण के बाद देख पाना संभव नहीं है. इधर भी 2–4  फोटो के बाद हम लोग गंभीरता से खाने का जुगाड़ ढूँढने लगे.




खाने के बारे में मैं इतना ही कहना चाहूँगा की हमने 200 रुपे में 5 लोगो ने भेलपुरी, वडा, पकोड़े और चाय निबटा दी और स्वाद ऐसा की बंगलौर में तो लालटेन लेकर ढूँढने से भी ना मिले. पास में ही हिन्दुपुर का बड़ा बाजार है जहाँ आप फल सब्जी खरीद सकते हो. बाजार मे एक भुजिया और मिठाई की दुकाने भी है जंहा से आप भाती भाती की ताज़ा नमकीन भुजिया खरीद सकते है स्वाद भी मस्त होता है.


शाम के तक़रीबन 6 बजे अपन तो निकल लिए लेपक्षी की यादे और फोटो दोनों लिए अपने ठिकानो की तरफ और लौटते हुए वो डूबती शाम आई बारिश, पहाड़ो के वो मंजर, हाथ में ताज़ा भुजिया और गाड़ी में बजता “ना कजरे की धार ना मोतियों के हार” बस पता ही नहीं कौन सी दुनिया में ले जा रहा था.


और इसी के साथ वो रविवार की शाम ढल गयी. चलो फिर मिलते है फुर्सत में तब तक के लिए
“हवा में प्रणाम”


Comments

  1. Bhai ko Hawa Mai pranam , lagta Hai lepakshi hokar ana padega

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A PHOTOGRAPHIC VISIT TO HARYANVI CULTURE

शहीद

शहीद PDF 



वो रोज धमाके सुनते है
जीते हैं जंग के साये में
वो खडे हुए हैं सीमा पर
ले असला अपनी बाहों में

गोलियों की बरसात में
वो लाल लहू से नहाते हैं
होली हो या दिवाली हो
सब सीमा पर ही मनाते हैं

इक आस जो घर पर जाने की
जो पल भर में धुल जाती है
सीमा पार से आकर गोली
साथी को डंस जाती है

फिर कहते हैं इस हालत में
हम घर को जा सकते नहीं
सर कटा सकते हैं लेकिन
सर झुका सकते नहीं
फिर खून खौल सा जाता है
रह रह कर गुस्सा आता है
वो घुंट लहू का पीते हैं
मर मर कर फिर भी जीते हैं

इस वतन चमन के खातिर
अपनी जान देश पर वार गए
खाकर गोली सीने पर वो
सीधे स्वर्ग सीधार गए

सजा तिरंगे में अर्थी‎ जब
घर पर लाई जाती है
याद करा कर कुर्बानी
गोलियां चलाई जाती हैं

सरकारी दलाल भी आते हैं
शहादत गिनाई जाती है
लाख रुपे का चैक दिखा कर
फोटो खिचवाई जाती है

बस इतना सा ये किस्सा है
बस इतनी सी ये कहानी है
ना इनका कोई बुढ़ापा है

सलाम ना आया

सलाम ना आया (PDF)




थी गुफ़्तगू इक आने के उसकी ढल चला आफताब पर पैगाम ना आया
चढ़ा था सुरूर मय खाने में थे हम पर सदियों से प्यासों का वो “जाम” ना आया
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प्रदीप सोनी 

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