नृत्याग्राम ( बेंगलुरु )

July 18, 2017



दिन: रविवार
मौसम: बादल छाए थे पर सूरज का छुप छुप कर हमला जारी था.
जगह: नृत्याग्राम  ( बेंगलुरु )

रात के 10 बजे नृत्याग्राम जाने का प्लान बनाये जाने के बाद मैं और डॉक्टर साहब सुबहे 9 बजे मिले और जाने के लिए कैब ढूँढने लगे. पर इतनी दूर जाने के लिए उबर और ओला दोनों ने हाथ उठा दिए फिर हम निकले BMTC की काबिल बसों में.



नृत्याग्राम बेगलुरु के मैन बस स्टैंड से तक़रीबन 30 किलोमीटर दूर "हेसरागट्टा" गाँव के बीच बना है. और वंहा जाने के लिए आप अपने मूड, टाइम और औकात अनुसार गाड़ी इस्तेमाल कर सकते है.

हम लोगो ने वहा जाने के लिए ऑटो, BMTC और CAB तीनो को सेवा का मौका दिया. हालांकि हम वंहा देर से  पहुचने वाले थे पर हमे जल्दी कोई नहीं. ऐसे ही होते है राजे बेटे”.



काफी टाइम बाद बस में बड़ी तसल्ली से यात्रा हो रही थी. वैसे जब हम लोग शहर से दूर गाँव की ओर जाते है तो ऐसा लगता है मानो समय ठहर रहा हो और ऊपर से अगर आसमान में बादल छाए हो तो वो आपको अलग ही दुनिया में ले जाते है. जैसे आँखे प्यासी हो प्रकृति से जुड़ने के लिए.


बस ने हमे हेसरागट्टा बस स्टैंड पर उतारा जंहा उतर कर एकदम छोटे शेहरो वाली फीलिंग रही थी. और हम जैसो की प्यास तो चाय के अलावा कोई भुझा नहीं सकता.


फिर चाय पीकर निकलने से पहले हमने अंकल से पूछा:

मैं : अंकल ये नृत्याग्राम कितनी दूर है.
अंकल: भैया यहाँ से सीधे को जाना 4 किलोमीटर आता.

मौसम मस्त था तो मैं और डॉक्टर साहब पैदल ही निकल पड़े अपनी मंजिल की ओर


रस्ते में काफी हरयाली फैली हुई थी और हलकी हलकी वो बारिश की फुहारे ऐसे लग रहा था जैसे हमारा स्वागत कर रही हो. काफी टाइम बाद बड़ी फुर्सत से पैदल चलने का आनंद लिया जा रहा था


मुझे तो अपने कॉलेज के दिनों की याद गयी जब हम लोग बस स्टैंड से कॉलेज जाने के लिए ऐसे ही संकरे रस्ते पर पैदल जाया करते थे.


तभी हमे हेसरागट्टा रेसोर्वेर दिखाई दिया. तो मैं और डॉक्टर साहब पहुँच लिए मौके का जायजा लेने. कानो में ना जाने क्या कहते तेज हवा और दूर तक फैला हुआ वो खाली और हरयाली वाला मंजर किसी और ही दुनिया में ले जाता है.


यहाँ पर फुर्ती से दर्शन करने के बाद हम लोग नृत्याग्राम के लिए निकले जो की हेसरागट्टा रेसेर्वेर से 3 किलोमीटर दूर था. अब पैदल दांडी यात्रा बहुत हो चुकी थी तो हम लोगो ने लिफ्ट मांगना शुरू किया.


एक बार फिर से कॉलेज के वही रास्ते याद गए और इसी के साथ याद गयी वही लिफ्ट मांगने वाली हरकते. वैसे अगर दो जवान हट्टे कट्टे लौंडे वैसे ही सड़क पर दिख जाये तो लोग तेजी से अपनी गाड़ी निकाल लेते है और हम तो लिफ्ट मांग रहे थे. फिर किसी भले मानुष ने अपनी कार रोकी और हमे वह छोड़ा. वकील साहब थे वो अपना कार्ड देकर गए.


अब हम पहुंचे थे नृत्यग्राम. बहार से ही इसके जलवे शुरू हो गए थे ऐसा लग रहा था मानो की वक्त पुराने में वापिस आये हो.


प्रवेश के बाद आपको 100 रुपे का एक टिकेट लेना पड़ता है जो की बिलकुल महंगा नहीं कहा जा सकता. हमारे इधर पहुँचने का कारण POTM था इसका मतलब है Poetry on the Move. हम इसमें हिस्सा लेने आये थे


प्रोगराम काफी अच्छा रहा लोगो ने अपनी अपनी बेहतरीन पेशकारी दी. और अच्छा लग रहा था लोगो को इस कदर प्यार से सुनते-सुनाते देखते हुए


फिर बाद में हम लोगो ने नृत्याग्राम की बाकी जगह को निहारना शुरू किया.


कुल मिला के ये जगह काफी अच्छी है और अगर मौका मिले तो आपको जरुर यहाँ आना चाहिए.



लौटते वक्त भी हमे एक सज्जन सर ने लिफ्ट दी. सर वैसे तो बंगाल से थे पर रह पूरे भारत में चुके है. उनके साथ भी बातचीत में काफी मजा आया और रस्ते में सभी लोगो ने इकठा होकर मिलजुल कर खाना खाया.


लौटते टाइम हमे चुतुर्वेदी सर ने लिफ्ट और काफी सारा ऐसा ज्ञान दिया जो फेसबुक या whatsapp पर नहीं बल्कि किताबे पढने से मिलता है और शाम को कमरे पे पहुंचकर ऐसा लग रहा था जैसे आज ही काफी महीनो में ढंग का इतवार गया है.


उम्मीद है भगवान ऐसे ही छोटे मोटे एडवेंचर जरी रखेगा जिंदगी में चलो फिर मिलते है किसी और ट्रिप पर किसी और जगह तब तक के लिए.

 वैसे बता दू डॉक्टर साहब भी लाल रंग के जबरदस्त फैन है 

हवा में प्रणाम

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