Skip to main content

नृत्याग्राम ( बेंगलुरु )



दिन: रविवार
मौसम: बादल छाए थे पर सूरज का छुप छुप कर हमला जारी था.
जगह: नृत्याग्राम  ( बेंगलुरु )

रात के 10 बजे नृत्याग्राम जाने का प्लान बनाये जाने के बाद मैं और डॉक्टर साहब सुबहे 9 बजे मिले और जाने के लिए कैब ढूँढने लगे. पर इतनी दूर जाने के लिए उबर और ओला दोनों ने हाथ उठा दिए फिर हम निकले BMTC की काबिल बसों में.



नृत्याग्राम बेगलुरु के मैन बस स्टैंड से तक़रीबन 30 किलोमीटर दूर "हेसरागट्टा" गाँव के बीच बना है. और वंहा जाने के लिए आप अपने मूड, टाइम और औकात अनुसार गाड़ी इस्तेमाल कर सकते है.

हम लोगो ने वहा जाने के लिए ऑटो, BMTC और CAB तीनो को सेवा का मौका दिया. हालांकि हम वंहा देर से  पहुचने वाले थे पर हमे जल्दी कोई नहीं. ऐसे ही होते है राजे बेटे”.



काफी टाइम बाद बस में बड़ी तसल्ली से यात्रा हो रही थी. वैसे जब हम लोग शहर से दूर गाँव की ओर जाते है तो ऐसा लगता है मानो समय ठहर रहा हो और ऊपर से अगर आसमान में बादल छाए हो तो वो आपको अलग ही दुनिया में ले जाते है. जैसे आँखे प्यासी हो प्रकृति से जुड़ने के लिए.


बस ने हमे हेसरागट्टा बस स्टैंड पर उतारा जंहा उतर कर एकदम छोटे शेहरो वाली फीलिंग रही थी. और हम जैसो की प्यास तो चाय के अलावा कोई भुझा नहीं सकता.


फिर चाय पीकर निकलने से पहले हमने अंकल से पूछा:

मैं : अंकल ये नृत्याग्राम कितनी दूर है.
अंकल: भैया यहाँ से सीधे को जाना 4 किलोमीटर आता.

मौसम मस्त था तो मैं और डॉक्टर साहब पैदल ही निकल पड़े अपनी मंजिल की ओर


रस्ते में काफी हरयाली फैली हुई थी और हलकी हलकी वो बारिश की फुहारे ऐसे लग रहा था जैसे हमारा स्वागत कर रही हो. काफी टाइम बाद बड़ी फुर्सत से पैदल चलने का आनंद लिया जा रहा था


मुझे तो अपने कॉलेज के दिनों की याद गयी जब हम लोग बस स्टैंड से कॉलेज जाने के लिए ऐसे ही संकरे रस्ते पर पैदल जाया करते थे.


तभी हमे हेसरागट्टा रेसोर्वेर दिखाई दिया. तो मैं और डॉक्टर साहब पहुँच लिए मौके का जायजा लेने. कानो में ना जाने क्या कहते तेज हवा और दूर तक फैला हुआ वो खाली और हरयाली वाला मंजर किसी और ही दुनिया में ले जाता है.


यहाँ पर फुर्ती से दर्शन करने के बाद हम लोग नृत्याग्राम के लिए निकले जो की हेसरागट्टा रेसेर्वेर से 3 किलोमीटर दूर था. अब पैदल दांडी यात्रा बहुत हो चुकी थी तो हम लोगो ने लिफ्ट मांगना शुरू किया.


एक बार फिर से कॉलेज के वही रास्ते याद गए और इसी के साथ याद गयी वही लिफ्ट मांगने वाली हरकते. वैसे अगर दो जवान हट्टे कट्टे लौंडे वैसे ही सड़क पर दिख जाये तो लोग तेजी से अपनी गाड़ी निकाल लेते है और हम तो लिफ्ट मांग रहे थे. फिर किसी भले मानुष ने अपनी कार रोकी और हमे वह छोड़ा. वकील साहब थे वो अपना कार्ड देकर गए.


अब हम पहुंचे थे नृत्यग्राम. बहार से ही इसके जलवे शुरू हो गए थे ऐसा लग रहा था मानो की वक्त पुराने में वापिस आये हो.


प्रवेश के बाद आपको 100 रुपे का एक टिकेट लेना पड़ता है जो की बिलकुल महंगा नहीं कहा जा सकता. हमारे इधर पहुँचने का कारण POTM था इसका मतलब है Poetry on the Move. हम इसमें हिस्सा लेने आये थे


प्रोगराम काफी अच्छा रहा लोगो ने अपनी अपनी बेहतरीन पेशकारी दी. और अच्छा लग रहा था लोगो को इस कदर प्यार से सुनते-सुनाते देखते हुए


फिर बाद में हम लोगो ने नृत्याग्राम की बाकी जगह को निहारना शुरू किया.


कुल मिला के ये जगह काफी अच्छी है और अगर मौका मिले तो आपको जरुर यहाँ आना चाहिए.



लौटते वक्त भी हमे एक सज्जन सर ने लिफ्ट दी. सर वैसे तो बंगाल से थे पर रह पूरे भारत में चुके है. उनके साथ भी बातचीत में काफी मजा आया और रस्ते में सभी लोगो ने इकठा होकर मिलजुल कर खाना खाया.


लौटते टाइम हमे चुतुर्वेदी सर ने लिफ्ट और काफी सारा ऐसा ज्ञान दिया जो फेसबुक या whatsapp पर नहीं बल्कि किताबे पढने से मिलता है और शाम को कमरे पे पहुंचकर ऐसा लग रहा था जैसे आज ही काफी महीनो में ढंग का इतवार गया है.


उम्मीद है भगवान ऐसे ही छोटे मोटे एडवेंचर जरी रखेगा जिंदगी में चलो फिर मिलते है किसी और ट्रिप पर किसी और जगह तब तक के लिए.

 वैसे बता दू डॉक्टर साहब भी लाल रंग के जबरदस्त फैन है 

हवा में प्रणाम

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

अलविदा अम्मा

कल रात से ही माहौल गरमाया हुआ था और लोग हॉस्पिटल के सामने, सडको पर और जंहा जगह मिल जाये वंही भगवान को मानाने में लगे हुए थे. पर इस बार ऐसा लग रहा था की भगवान नहीं मानेंगे मगर लोग तो बिचारे भोले भाले होते है.
आज सुबहे 5 बजे अलार्म बजा तो देखा की टीवी चल रहा है और साथ वाले पलंग पर लेटे लातिश भाई बोले “ AMMA NO MORE YAAR”. मुझे लगा की लातिश भाई भी अम्मा के हार्डकोर फैन है. वैसे भी अपन को या कहे की सभी को पहले से ही आईडिया हो गया था की ज्यादा टाइम है नहीं अम्मा के पास. आज सारा दिन चर्चा का मुद्दा रही अम्मा टीवी, लोग, सड़क जहा देखो अम्मा ही अम्मा हो रही थी. मुझे तमिल नाडू का राजनीती तंत्र अजीब या कहे व्यक्ति केन्द्रित लगता है यहाँ के लोग राजनेताओ को भगवान का दर्जा देते है. नेताओ द्वारा अम्मा के पैर छूने की बात तो जग जाहिर है. कहा जाता है की शादी के टाइम लोग जयललिता जी की बड़ी सी मूर्ति आशीर्वाद देते हुए लगते है जिसमे हाथो से अम्मा फूल बरसाती है. मतलब अम्मा को भगवान का दर्जा है.


कुछ लोगो के साथ हुई बाते आप लोगो से साझा करता हूँ ये लोग तमिल नाडू के निवासी या वंहा से तालुक रखते है: 
अम्मा ने गरीबो …

Life @ MRK

इस पोस्ट का मकसद किसी भी तरह से कॉलेज की प्रशंसा या बुराई करना नहीं है. ये पूर्ण रूप से व्यक्तिगत विचार है अगर ये विचार किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु के विचारों से मेल खाते है तो उसे महज संयोग और मेरा दोस्त कहा जायगा.
हरियाणा के दक्षिण में बसे शहर रेवाड़ी से 7 किलोमीटर दूर खेतो के बीचो बीच उगे इस कॉलेज को “ MATA RAJ KAUR INSTITUTE OF ENGINEERING & TECHNOLOGY “ नाम से जाना जाता है.बनावट के हिसाब से ठीक ठाक ज़बरदस्त, स्टाफ के हिसाब से भी कुल मिला के बढ़िया. सुविधाओं के लिहाज से अच्छा कहा जा सकता है. खेतो के बीच में बसे होने के कारण लडको को कॉलेज से फरार होकर पिक्चर देखने जाने में काफी परेशानी उठानी पड़ती है. कभी कभी तो कॉलेज से भागे लड़के ऑटो ना मिलने की वजह से वापिस कॉलेज ही आ जाते है. कॉलेज की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा हरयाणा के बहार के लौंडो का भी होता है. जो थोड़े दिन में हरयाणवी बोलते देखे जा सकते है. अब काफी लोगों के मन में सवाल आया होगा की लड़कियाँ कैसी है भाई तो अपना जवाब है जैसा देखने वाला देखे. बाकि अपन को तो कोई खास लगी नहीं.


अब सब सोच रहे होंगे के ये सब क्यों बताया जा रहा है तो लिजीये …

A PHOTOGRAPHIC VISIT TO HARYANVI CULTURE

शहीद

शहीद PDF 



वो रोज धमाके सुनते है
जीते हैं जंग के साये में
वो खडे हुए हैं सीमा पर
ले असला अपनी बाहों में

गोलियों की बरसात में
वो लाल लहू से नहाते हैं
होली हो या दिवाली हो
सब सीमा पर ही मनाते हैं

इक आस जो घर पर जाने की
जो पल भर में धुल जाती है
सीमा पार से आकर गोली
साथी को डंस जाती है

फिर कहते हैं इस हालत में
हम घर को जा सकते नहीं
सर कटा सकते हैं लेकिन
सर झुका सकते नहीं
फिर खून खौल सा जाता है
रह रह कर गुस्सा आता है
वो घुंट लहू का पीते हैं
मर मर कर फिर भी जीते हैं

इस वतन चमन के खातिर
अपनी जान देश पर वार गए
खाकर गोली सीने पर वो
सीधे स्वर्ग सीधार गए

सजा तिरंगे में अर्थी‎ जब
घर पर लाई जाती है
याद करा कर कुर्बानी
गोलियां चलाई जाती हैं

सरकारी दलाल भी आते हैं
शहादत गिनाई जाती है
लाख रुपे का चैक दिखा कर
फोटो खिचवाई जाती है

बस इतना सा ये किस्सा है
बस इतनी सी ये कहानी है
ना इनका कोई बुढ़ापा है

सलाम ना आया

सलाम ना आया (PDF)




थी गुफ़्तगू इक आने के उसकी ढल चला आफताब पर पैगाम ना आया
चढ़ा था सुरूर मय खाने में थे हम पर सदियों से प्यासों का वो “जाम” ना आया
खड़े थे कुचे में इक झलक ऐ दीदार को वो आये नज़र मिली पर सलाम ना आया
मिली बदनामिया और मिली शौहरते पर हसरतों वाला दिली मुकाम ना आया
उसका था शहर और उसकी अदालते हम हुए हलाक उसे इल्जाम ना आया
“दीप” हुआ बदनाम सारे इस जंहा में  पर उस बेवफा का कही नाम ना आया
प्रदीप सोनी 

IAS सोनू

रात का वक्त हो चला है. डिम रोशनी में जलते उसबल्ब को देखता सोनू भयंकर सोच में है. अब शायद रिश्ता साजुड़ चला है उस जीरोवाट केबल्ब के साथ. ना जाने कितनी ही रात उसने उस बल्ब के साथ बातें की हैं.



आज शुरू होते ही खत्म हो जाने वाले इस कमरे में पूरे 2 साल हो चुके हैं. 2 साल हो चले हैं एक उम्मीद को पालते हुए. और हो चले हैं 2 साल इक सपने को जीते जीते.आज बात हो रही हैबल्ब सेकि किस कदर बीते हैं 2 साल.अब भी याद है जब वहउम्मीदों की पोटलीलिए दिल्ली आया था. चेहरे पर लाली और जुल्फें एकदम तेरे नाम के राधे भैया जैसी. पर अब 2 साल बाद राधे भईया वाली जुल्फे मनीष सिसोदिया के बालों में बदल चुकी हैं. 2 साल पहले वाला बाका सोनू हिंदी फिल्मो वाला लाला बन चुका है.पेट आ गयाहै सोनू को.
घर से आती उम्मीदों वाले फोन पर जब पूछा जाता कि बेटा पढ़ाई कैसे चल रही है. तो एक क्षण को सोचकर सोनू बोलता पढ़ाई तो अच्छी चल रही है माँ पर टाइम का नहीं मालूम कैसा चल रहा है.
जब छोटी बहन बोलती है कि " भैया इस राखी पर मुझे आप की लाल बत्ती वाली गाड़ी चाहिए ". फिर भी सोनू खामोशी से दबी आवाज़ में “हां” कर देता है.

पिता जी से अक्सर बात…

मेरे गुरु है नमन तुम्हे

दूर तलक था अँधियारा
जब जीवन का आगाज हुआ

अनजाना सफ़र अनजानी डगर
मकसद जीवन का राज हुआ

जो मिले आप तो मिला साथ
किसी धुन का जैसे साज हुआ

इस ज्ञान डगर पर चलने से
मुझे जीने का अंदाज हुआ

बन दीप गुरु जब आप जले
तो रोशन ये संसार हुआ

हे मेरे गुरु है नमन तुम्हें
मेरा धन्य जीवन आज हुआ


प्रदीप सोनी

पेपर और धक्के

सर्दियों ने भी जुल्म किया हुआ है कम्बखत दिन निकल कर कब रात हो जाती है अँधेरे अँधेरे में कुछ पता ही नहीं लगता ऊपर से पेपर की चिंता अलग. बिलकुल ऐसा लगता है जैसे बर्फ की सिल्ली पर लेटकर बेल्ट मारी जा रही हो. वो तो सभी को पता ही है कहा मारी जाती है. यार कल सुबह पेपर है और पढ़ा भी कुछ नहीं और उससे भी बड़ी टेंशन कल पेपर के टाइम तक कॉलेज पहुंचेगे भी या किसी मोड़ पे खड़े होकर लिफ्ट मांगते घूमेंगे. कोहरे की वजह से बस लेट हो जाये, आँख ना खुला और सौ बात. इन्ही खयालो ने ही मुझे और टीटू को 10 मिनट के अन्दर बस स्टैंड पंहुचा दिया. मैं और टीटू हाथ में झोला लिए बस स्टैंड पे झज्जर वाली बस के सामनेखड़े थे. तो भाई मौसम बड़ा ही सुहाना सा था एकदम आसमान काली घटाओ से घिरा हुआ मंद मंद सर्दी. बोले तो सेक्सी मौसम. हिंदी फिल्मो में जिसे बेईमान मौसम कहा जाता है. “ सीटी बजी “ "चलो भाई सारे बैठ लो चल पड़ी बस." अब भईया अपनी बसों में ये रुल था की अगर बस के अन्दर बैठ के गए तो 25 रुपे किराया और छत पर बैठ कर गए तो 15 रुपे किराया. तब मैंने और टीटू ने दिमाग लगाया की छत पर ही चलते है यार 10 – 10 रुपे बचेंगे उतर के समोसे ख…

भारतीय माँ के हथियार

भारतीय माँ के हथियार