फुर्सत


अक्सर दफ्तर से निकलने में शाम ढल जाती है और लेट होने के कारण हमेशा ये ही रहता है की बस तूफ़ान की तरह घर पंहुचा जाये. निकलने से पहले CISF वाले भाई से भी 2 मिनट हाल चाल पूछ लेते है और ठीक 2 मिनट बाद वही रट्टा रटाया डायलॉग “ ठीक है भैया शाम हो गयी फुर्सत में मिलता हूँ  

और ये ही सिलसिला अकसर दिनों, हफ्तों और महीनों तक चलता रहता. 

उस दिन भी शाम ढल गयी
उस दिन भी भाई साहब गेट पर मिले
और उस दिन भी मैंने कहा चलता हूँ भैया फुर्सत में मिलते है

भाई: अरे रुक जा भाई “ 2 मिनट रुक जा. फुर्सत तो मरे बाद ही मिलेगी 

फिर भाई साहब ने बताया की उनका ट्रान्सफर गया है और कल ही निकल रहे है. फिर 2 घंटे की बातचीत का जो सेसन हुआ वो भी एकदम दिल से जुड़कर की हम पिछले कुछ महीनों से एक दूसरे को इतना नहीं जानते थे जितना उस दिन 2 घंटे की बात में जानने लगे. और कसम से उस दिन बहुत अच्छा लग रहा था.

कई बार लगता है की हम रोज की भागा दौड़ में उन चीजों को छोड़ देते है. जो हमे एक दुसरे से जोड़े रखती है. उस दिन मुझे एक बात का अंदाजा ये भी हुआ की अगर कोई हमसे या हम किसी से बात करना चाहते है तो इसका ये मतलब नहीं है की वो हमसे बात किये बिना नहीं रह सकता या उसे हमारी कोई जरुरत है. बस कुछ चीज़े बिना मतलब के भी की जाती है चाहे बातचीत हो या कुछ हद तक प्यार.  

कुल मिला के ये है की बस कभी 2 मिनट निकलकर अपने यारोप्यारो से बात कर लेनी चाहिए. क्योकि फुर्सत तो मरने के बाद ही मिलेगी

हवा में प्रणाम

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