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MYSORE PALACE



नींद शायद अभी खुली भी नहीं थी कि एक दम से कानों में आवाज पड़ी.  सोनी भाई 1 घंटे में रेडी हो जाओ मैसूर चल रहे हैं. 50 मिनट पूरे होते होते  हम सभी लोग गाड़ी में विराजमान हो गए थे. फ्लो फ्लो में पता ही नहीं चलता टाइम का की कब लड़के तैयार हो जाये और घूमने-फिरने के मामले में तो हम वैसे ही चटकीले हैं.
GET SET GO
मैसूर की कर्नाटका के एक बड़े जिले के रूप में पहचान होती है.  बेंगलुरु से तकरीबन 150 किलोमीटर दूर स्थित यह शहर अपनी हरियाली और पर्यावरण के लिए मशहूर है और मशहूर है मैसूर पैलेस और वृंदावन गार्डन के लिए भी. वैसे कहा तो यह भी जाता है कि मैसूर में देश कासबसे बेहतरीन दशहरा मनाया जाता है.

बेंगलुरु से मैसूर जाते वक्त सड़क सामान्य  रूप से अच्छी है और रास्ते में आपको VIVO और OPPO मोबाइल के एडवर्टाइजमेंट के बीच पहाड़ और छोटे कस्बे भी दिखाई देंगे. कुछ कुछ जगहों पर तो केवल VIVO और OPPO मोबाइल के ऐड ही दिखाई देंगे.  बेंगलुरु मैसूर रोड वैसे काफी हद तक हरा भरा है और वाहन भी ठीक-ठाक संख्या में चलते हैं.

जैसे ही अपनी पैलेस रोड पर एंट्री हुई एक भाई बाइक लेकर हमारा पीछा करने लग गया.  “दोस्त ने पूछा क्या है भाईउसने भी बड़े गंभीर स्वर में कहांसर होटल चाहिए होटल.

हमने भी कहा बता भाई बहुत भूख लगी है
भाई ने फरमाया खाने का नहीं सर रहने के लिए
बाद में हमें एक मारवाड़ी होटल मिला खाना भी ठीक-ठाक था. और महंगा भी ठीक-ठाक था.
अब अपन लोग पैलेस के गेट में पर थे.


मैसूर पैलेस के लिए कुछ ध्यान रखने लायक बातें.

एंट्री फीस ₹ 40 पर सिर है.
जूते जमा कराने के लिए व्यवस्था है
प्रोफेशनल कैमरा अंदर नहीं ले जा सकते
वैसे तो फोटो लेना मना है पर फुर्ती से ली जा सकती है
पैलेस की ज्यादा जानकारी के लिए गाइड करना बेहतर रहेगा.
अंदर जाने के बाद सही में लगता है जैसे राजा महा राजाओं के महल में आए हैं
हम तो रुके नहीं वरना कहा जाता है की रात को  महल का नज़ारा बेहद खूबसूरत होता है

मिठाई की मशहूर दुकान "गुरु स्वीट्स "
मैसूर पैलेस के इतिहास के बारे में मैं बस इतना कहना चाहूंगा कि Google पर पढ़ लेना.

मैसूर पैलेस में घूमने के बाद हम लोग तुरंत प्रभाव से वृंदावन गार्डन की ओर निकल पड़े.  मैसूर पहले से तकरीबन 21 किलोमीटर दूर वृंदावन गार्डन  है.  गार्डन शहर से काफी हटकर एक खाली स्थान पर बनाया गया है जहां से कावेरी नदी का डैम मौजूद है. इंग्लिश में रिजर्व भी कहते हैं.



वृंदावन गार्डन पहुंचते ही 20 रूपय प्रति व्यक्ति टिकट का प्रावधान है पर चिंता ना करें पैसा वसूल जगह है
नदी नकली धरने  झील   नाव  फूल चिड़िया तितली बुलबुल आप सब का दीदार इधर कर सकते हैं.  पर कोशिश करनी चाहिए कि भरी दोपहर ना पहुंचा जाए. अन्यथा रुमाल हाथ में रखना पड़ सकता है.


वृंदावन गार्डन की सबसे ऊपर वाली चोटी पर जाने के बाद एक बेहतरीन नजारा दिखाई देता है दूर तक फैले पहाड़ों को देखकर और बात की हरियाली को देखकर दिल गार्डन गार्डन हो जाता है. और आस-पास  खिले हुए फूल और मंडराती हुई चिड़िया तितली मन मोह लेती है.

कावेरी नदी का बहाव देख कर बस ये ही कहा जा सकता है की अगर कूदे तो हिन्द महा सागर में ही मिलोगे.

और अंत में आई हुई बारिश जिसने मिट्टी में खुशबू उठा दी शायद बता रही थी कि हमारे निकलने का समय हो गया है.

शाम के तकरीबन 6:00 बजे हम लोग मैसूर वृंदावन गार्डन की बहुत सी यादें मन में और बहुत सी फोटो कैमरे में और बहुत सी टोल टैक्स की पर्चिया पर्स में लिए हम निकल पड़े.

ठीक है दोस्तों मिलते हैं फिर किसी अगले सफर पर तब तक के लिए

हवा में प्रणाम


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A PHOTOGRAPHIC VISIT TO HARYANVI CULTURE

शहीद

शहीद PDF 



वो रोज धमाके सुनते है
जीते हैं जंग के साये में
वो खडे हुए हैं सीमा पर
ले असला अपनी बाहों में

गोलियों की बरसात में
वो लाल लहू से नहाते हैं
होली हो या दिवाली हो
सब सीमा पर ही मनाते हैं

इक आस जो घर पर जाने की
जो पल भर में धुल जाती है
सीमा पार से आकर गोली
साथी को डंस जाती है

फिर कहते हैं इस हालत में
हम घर को जा सकते नहीं
सर कटा सकते हैं लेकिन
सर झुका सकते नहीं
फिर खून खौल सा जाता है
रह रह कर गुस्सा आता है
वो घुंट लहू का पीते हैं
मर मर कर फिर भी जीते हैं

इस वतन चमन के खातिर
अपनी जान देश पर वार गए
खाकर गोली सीने पर वो
सीधे स्वर्ग सीधार गए

सजा तिरंगे में अर्थी‎ जब
घर पर लाई जाती है
याद करा कर कुर्बानी
गोलियां चलाई जाती हैं

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शहादत गिनाई जाती है
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फोटो खिचवाई जाती है

बस इतना सा ये किस्सा है
बस इतनी सी ये कहानी है
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सलाम ना आया

सलाम ना आया (PDF)




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