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Showing posts from 2018

भगवान नहीं दिखे

इस बात को तक़रीबन 10 साल गुजर चले है मगर आज भी जब ये किस्सा याद करता हूँ तो आँखों में चमक और होठो पर हंसी लहर सी जाती है.
वो शनिवार की दोपहर में सचिन ने एकाएक बुलाया और कहा “आज खाटू श्याम जी के चले क्या..?” हम चाचा – ताऊ केबालको का गुट अगले आधे घंटे में तैयार था. निकलने से पहले 10 मिनट में यात्रा का सारा खांचा तैयार हो गया और खाने पीने का माल बिस्कुट भुजिया इकठा कर लिया गया. निकलते निकलते वक्त शाम के 5 का हो चला था और 5 :30 होते होते हम विचित्र प्राणियों से भरी हुई मारुती 800 दिल्ली से खाटू शाम जाने वाले हाईवे पर पूर्ण रफ़्तार से चल रही थी.
ये वाक्या मेरे जेहन में इसलिए भी ज्यादा घर करता है क्युकी घर वालो की अनुपस्थिति में ये मेरे जीवन की पहली यात्रा थी तो मैं काफी खुश और रोमांचित महसूस कर रहा था. राजस्थान में घुसते ही एक शानदार ढाबे पर गाड़ी लगी और हम लोग खाने पर टूट पड़े इतना तो ध्यान है की पेट फटने तक खाना खाया था.
लम्बी दूरी होने के कारण हमारे फर्नान्डो अलोंसो (सचिन) और माइकेल शुमाकर (कालू) स्टीयरिंग बदल बदल के गाडी चला रहे थे. गाडी में बजते गाने और फटी हुई आवाज में पीछे पीछे गाते हम, ढल…

सफ़र

ऐ मेरे सफर के रहियो एक दिन ये सफर भी नहीं होगा और यह जिंदगी भी नहीं
मैं इसलिए नहीं चलता कि मुझे तुम्हें दिखाना है मैं इसलिए चलता हूं कि ये रास्ता कुछ अंजाना है
मिलेंगे तुमसे राही और तुमसे मुसाफिर भी मुझे तो बस हाथ मिलाना है और आगे बढ़ते जाना है
उम्मीद नहीं करता मैं तुम्हारे साथ चलने की उम्मीद बस ये कि चलो साथ दो पल के लिए
सफर लम्बा है और मंजिल दूर तुम शायद चल नहीं पाओगे और मंजिल आ नहीं पाएगी
मिलूंगा मैं तुमसे मुस्कुरा कर और मुस्कुराकर ही हाल पूछूंगा
लेकिन परदेसी हूं मैं मुस्कुराकर छोड़ जाऊंगा तुम्हें बीच राह में
कभी यह गिला ना करना कि छोड़ गया वो हमें बिछड़न पता है इसलिए गले नहीं लगाते
हमेशा साथ निभाने का वादा नहीं करता मैं मेरी मंजिल दूर है और सफर लंबा
कुछ देर ठहर कर जानना चाहता हूं तुम्हें तुम्हें नहीं मैं जानना चाहता हूं खुदा की उस फितरत को
बनाता है वही मिटाता है वही हस्ती ही है इक रोज मिट ही जाएगी
मुझे जल्दी है मैं इंतजार नहीं कर पाऊंगा अगर तुम ठहर गए तो मैं रुक नहीं पाऊंगा

इक सफ़र सामर्थ्य का

कहा जाता है की इंसान को अपनी औकात के हिसाब से सपने देखने चाहिए और पैर उतने ही पसारो जितनी आपकी रजाई हो. लेकिन कमब्खत ये समाज क्या जाने जब सपने पाले जाते है तो आसमान की ऊचाई नहीं देखि जाती.

बचपन के याद खाने से इक किस्से का जिक्र करना चाहता हूँ. शायद वो कॉलेज का दौर था नये नये बच्चे जब कॉलेज की देहलीज तक पहुचते है तो हज़ारो सपने और हज़ारो उमीदे लिए पहुँचते है. कुछ बनने के लिए, खुद को सिद्ध करने के लिए की जीवन में हम भी कुछ कर सकते है.

और युवा जीवन की सबसे बड़ी समर्थता सिद्ध करने के तरीके भी अलबेले ही होते है. बड़ी गाडी, बड़ी कोठी, नौकर चाकर और विदेशी छुट्टीया. केवल इन्ही से हम सिद्ध कर सकते है की हम कामयाब है.

तो इक दिन मैं और मेरा मित्र पवन ट्रेक्टर की घांस फूस से भरी ट्राली में लोड होकर जा रहे थे. हम दोनों बैठे बैठे बाते कर रहे थे की हमसे कुछ उचाई पर हवाई जहाज उड़ रहा था. उसकी आवाज कुछ इतनी थी की हमारा ध्यान भटक गया. काफी चमक रहा था वो धुप की रौशनी भी उस से टकराकर आँखों को चुभ रही थी.

तब मैंने हवाई जहाज को देखते देखते पवन को कहा " पवन यार एक दिन जरुर में हवाई जहाज में बैठूँगा वो भी बि…

इक मुस्कान ख़ामोश सी

रोज की तरह शाम के 6:00 बजे मैंने फोन लगाया. घंटी तो गई लेकिन किसी ने उठाया नहीं.
मैं फिर से चाय की चुस्कियां लेने लगा. और 5 मिनट बाद फिर से फोन लगाया... “ भाई अभी कुछ दिन मैं नहीं आ पाऊंगा”  और उन्होंने फोन काट दिया.
तब मैं सड़क के दाहिनी ओर देखते हुए गुडगांव जाने वाली बस की इंतजार करने लगा.
काफी दिन गुजर गए है उस बात को जब सत्यवान भाई साहब से बात हुई थी और आज जाते हुए अचानक उनकी कैब भी
दिखाई पड़ी.

मैंने कहा “ जीतू भाई साहब यह सत्यवान भाई साहब है ना???” उन्होंने गहराई से बाई और देखा और कहा "हां यार सत्यवान ही है... आ गया क्या...!!!"

मैंने पूछा जीतू भैया “ काफी दिन हो गए सत्यवान भाई साहब छुट्टी पर थे क्या”

जीतू भैया "तुझे नहीं पता क्या ...??? "
मैं : "क्या .... मुझे तो कुछ नहीं पता ...!!!"

“अरे भाई इनका एक बड़ा भाई था जो उस दिन हम जा रहे थे तब गाडी चला रहे थे... मुझे याद दिलाते हुए जीतू भाई साहब बताने लगे". हाँ हाँ ... मुझे भी धुंधला धुंधला याद आने लगा.

अच्छा क्या हुआ तो मैंने गंभीरता से पूछा..

शहर में बस्ता गाँव

छोटे क़स्बे आज भी ऐसे हुआ करते है जिनमे शहर और गाँव दोनों की जड़े बस्ती है. वैसे तो बढ़ती टेक्नोलॉजी ने जीवन में बोहोत कुछ बदला है मगर अब भी तेजी से बढ़ते डिजिटल इंडिया में एक पुराना भारत बस्ता है.
इतवार का दिन पा कर तस्सली से दूध लेने आज हमारे बिल्लू अंकल के इधर जाना हुआ अक्सर तो माता जी ही ये जिम्मेदारी संभालती है. मगर कभी कभी मैं भी डोली हाथ में लिए निकल लेता हूँ.

एक बात तो है की जब आप तकनीक और जीवन की भीड़ भाड़ से उब जाते है तब कही ना कही इन बसते हुए गांवों में उपलों से सजी ये दीवारे भी कही ना कही हुसैन साहब की पेंटिंग जैसी प्रतीत होती है.



अंकल हर बार की तरह खाट पर बैठे हुक्का सिल्गाये टीवी पर चल रही हरयाणवी रागनी सुन रहे है “ राम राम अंकल” “राम राम भाई गोला कई दिनों में आया आज “ “बस अंकल ऐसा ही है “
ये कहते हुए में घर के अंदर चला गया जंहा आंटी माटी के चूल्हे को लेप कर शाम के खाने के जुगाड़ में लगी है.
“राम राम आंटी “ “राम राम भाई गोला तेरी मम्मी ना आई आज” “ना आंटी “


पिछले 15 साल से हम लोग बिल्लू अंकल से ही दूध लेते आ रहे है शायद हम छठी सातवी में रहे होंगे तब से !! जब दूध 12 – 13 रुपे किलो हुआ कर…

कवच कुंडल दान

सुबह बग़ीचे मे पानी डालते वक़्त एका एक कोई मंगता आया.

करण: “बोलो प्रभु जो माँगोगे वो देगा करण गाड़ी, बंगले, दौलत शौहरत क़सम से पैसा बहुत है”

मंगता: “गाड़ी बंगले नही बेटा ये जो कवच से पहन रखे है ये दे दे”

करण: अरे इंद्र महाराज आप ??? कर दी ना इंसानों वाली हरकत आ गए बेटे को बचाने ... लो कवच कुंडल याद करोगे करण भी कोई था दानी



.

कवच के बदले मे इंद्र जी ने एका-अग्नि हथियार भी दिया था करण को जो दुश्मन को भस्म कर देता है दिवाली वाले अनार कि तरह

पांचाली

सुबह खाने कि सर्च मे निकले पांडव लोग द्रौपदी के स्वयंवर मे जा घुसे. और लगे घुमती मछली को तीर मारने.

वहाँ  मछली की आँख फोड़ते हुए अर्जुन ने स्वयंवर मे द्रौपदी को जीत लिया और उन्हें घर ले पहुँचा जहाँ माता कुंती डिनर बना रही थी.





भीम चिल्लाया: "ऐ माँ देख हम क्या लाए है...???"

कुंती: "अरे बेटा जो भी लाए हो पाँच हिस्सों मे बाट लो."

बस वही से द्रौपदी पाँच पांडवों कि पत्नी कहलाती है.





एका-अग्नि

करण युद्ध मे पांडवों पर ऐसे टूट के पड़ा जैसे नई सरकार आते ही अफसरो पर टूट पड़ती है. तब गोविंद को लगा आज तो ये अर्जुन कि फ़ोटो दीवार पर लटका कर ही रहेगा तभी कृष्ण रथ लेकर भागे भीड़ मे छिपने के लिए.

वहा कृष्ण ने मिनटोस खाई और बुलाया घतोटकच को और बोले:

कृष्ण: "बेटा घतोटकच करण पगला गया है हमारी सेना को उठा उठा कर फैंक रहा है बचा ले हमें". 


घतोटकच: अच्छा जी हम पर हमला.. अभी फैसला करता हूँ उनका. 

अभी 5 मिनट मे आया मैं !!! 

फिर जाते ही घतोटकच ने कौरवो को ऐसे पेला जैसे संभित पात्रा कांग्रेसियों को पेलता है. 

कौरवों कि हालत देख दुर्योधन करण के पास गया और बोला: 
"तू ही कर भाई कुछ नही सारे ही फ़्लैट आज डिलीवर हो जाऐंगे अपने" 

तभी युद्ध मे जोर से बम फटा और आग उठी. घतोटकच राख हो चुका था सारे पाडंव छाती पीट पीट कर रो रहे थे. 

करण भी माथा पकड़ कर बैठा था.

और कृष्ण जी महाराज मुह ढक कर खी खी कर रहे थे. 

इसी के साथ एका-अग्नि इस्तेमाल हो चुकि थी.



अभिमन्यु का रण

अभिमन्यु रथ पर विराजमान पूर्ण वेग से व्यूह कि और अगरसर था. माँ के गर्भ से व्यूह भेदने कि शिक्षा लिए वो कौरवी सेना पर टूट रहा.
एक के बाद एक व्यूह को ऐसे फाडता रहा जैसे राहुल बाबा देश के प्रधानमंत्री द्वारा बनाए सैंवधानिक नियमों को भरी सभा मे फाड़ता है.
मगर वह इस बात से कही अनजान था कि व्यूह संरचना केवल उसे ही निमटाने के लिए की गई है. जैसे जैसे वह व्यूह के अगले दौर मे पहुँचता कौरवी सेना के पिछले से ज़्यादा शक्तिमान योद्धा से झप्पीया मिलती.
पाँचवे दौर के बाद जब अभिमन्यु लड़ते लड़ते थक चुका और उससे आगे के व्यूह भेदने कि शिक्षा भी उसके पास नही थी तब इस बात का फ़ायदा उठा कौरवों ने उस पर एक साथ हमला कर दिया.
युद्ध के नियमों के ख़िलाफ़ और कायरता का प्रदर्शन करते हुए कौरवों ने अभिमन्यु को अकेला पा कर मार डाला.
मगर कहा जाता है कि मंत्री जी ( भगवान श्री कृष्ण ) भी चाहते थे कि कौरव युद्ध के नियम तोड़ अभिमन्यु को मारे ताकि अगली बार हम ( पांडव ) भी उसका हवाला देकर नियम तोड़ सके. 



छुट्टी

बेटे के छुट्टी आने के दिन गिनता बापू खाट पर दवाई लेकर लेटा हुआ है और माँ गोबर को दीवारों पर थाप रही है. निम्मी भी मिटटी खाने से बाज नहीं आती और उसकी मम्मी गाय का दूध निकाल रही है. सोनू अभी पांचवी में ही है पर सारी शाम गलियों में कंचे बजाता घूमता है. कमबख्त पढाई तो जैसे उसके सर से गुजरती है. आज बापू कुछ ज्यादा ही ख़ास रहा है. ना जाने ऐसे और कितने ही ख्याल उसके दिमाग में घर कर रहे है .
आँखे बंद कर के वो सोच रहा की की एक बार घर बात कर ही लू. की तभी हेलीकाप्टर की पंखड़ीया घुमने लगी और विनोद की धड़कन तेज हो गयी. हाथ में थमी पर पकड़ मजबूत हो गयी. कमर पर बंधी ग्रनेड की बेल्ट और गोलियों की मैगजीन को सँभालते हुए विनोद ने आँख खोली. आज वो अपने पहले स्पेशल ऑपरेशन के लिए उड़ान भर रहा है .जहा से वापसी में या तो तमगे मिलेंगे या फिर तिरंगे की चादर. पर जाने से पहले वो घर बात करना चाहता था.

युद्ध का कर्ण

रण में कौरव और पांडव आमने सामने थे. और दूर दूर तक फैली दोनों सेनाए आने वाले विध्वंस काल के आगोश में समाने वाली थी. 
तभी दूर कही महलों में नारिया युद्ध के कारणों पर चर्चा कर रही थी की दुर्योधन के लालच से युद्ध हो रहा है, किसी ने कहा द्रोपदी के आपमान से, कोई कहने लगी की कारण रहा है कर्ण का दुर्योधन के साथ मिल जाना. और उधर ही महल के किसी कौने में दर्पण के सामने बैठी कुंती ये सब सुनकर अश्क धार रो रही थी.

क्युकी शायद उसे दर्पण में युद्ध का कारण दिखाई पड़ रहा था.

परिंदों के आरमान

बेहद सुलझी हस्ती लिए वो शख्स काफी सरल ही रहता था. दिमाग पर लोड नाम की कोई चीज़ नहीं. खाना पीना ऐश करना शायद इन्ही के लिए परमात्मा ने उसे धरती पर भेजा था.
वैसे तो उस शख्स को में बोहोत थोड़े समय के लिए जान पाया लेकिन उसके दोस्तों के साथ उसके संबंधो के देखते हुए ये समझने में बिल्कुल समय नहीं लगा की ये बंदा तो विरला ही है. ना दिखावा, ना ढोंग, ना खामखाँ की हवा बाजी बस दिल की बात तुरंत जबान पर. शायद यही उसे अपनी तरह का एक प्राणी बनती थी.
लेकिन ये उम्र जवान !!! ये जवानी कमबख्त होती ही ऐसी है. ना जाने कितनी बीमारीया लेकर आती है. ना जाने कितने ही युवाओ को लील गयी ये जवानी की बीमारी. ना जाने कितनो का दिन का चैन और रातो की नींद हराम की है इस बीमारी ने. वो भी जवान था कितना बचता इस रोग से.
अचानक से आये उसके बर्ताव के परिवर्तन को मैं पहचान नहीं पाया. जब भी मिलता जल्दी में मिलता. और कहता काम है कुछ फुर्सत में आता हूँ. खड़े होकर आधा आधा घंटे बात करने की जगह 2 मिनट के हाल चाल पूछने ने ले ली. उसके साधारण चलने की गति भी ऐसी हो चली थी जैसे सीटी देने के बाद रेल की तरफ बढ़ते लोगो की हो जाती है. जब भी दिखता नज़रे …

कब्बाली डा ( किस्सा रजनीकांत फैन कुमार का )

मैं: एक चाय देना भईया...!!!
कुमार: राजा सर “रजनीकांत सुपर हीरो सर, फुल एक्शन, स्टाइल. कबाली सर बुक टिकेट”.
मैं चाय का कप हाथ में लिए उसकी टूटी फूटी हिंदी + अंग्रेजी + तमिल सुनता और चाय का रस लेता.
कुमार: “ok सर कबाली डा ....!!!!” और वो अपनी चाय की ट्रोली ले गया.
कुमार हमारे कैंटीन के डिलीवरी पर्सन और रजनीकांत के डाई हार्ट फैन. जब भी इनसे मुलाकात होती तो रजनीकांत के बारे में बताने लगते.कबाली मूवी आने में जब 6 महीने का वक्त था तब ही से वो शुरू “ राजा सर कबाली मूवी फुल एक्शन मूवी ” फ्रेंड्स के साथ देखना सर.
तब एडमिन ने उसकी इस कमजोरी का फायदा उठाया और जैसे ही वो चाय देने आता तो मैं कुमार को बोलता “काबाली डा... रजनीकांत सुपरस्टार ” और कुमार इतनाखुश होता की चाय के साथ बिस्कुट का पैकेट भी पकड़ा जाता.
एक बार तो वाक्या ये हुआ की अपन कंप्यूटर पर बैठे काम कर रहे की वो आया... “सर राजा सर प्लीज कम आउटसाइड”
मैं बहार गया तो उधर कुमार के साथ एक जनाब थे.
कुमार: “मुरली राजा सर फुल रजनी फैन”
और मुरली भी बड़ी उत्सुकता से मुस्कुराते हुए मुझसे हाथ मिलाने लगा.
मुरली: सर आई मुरली सुपरस्टार रजनीकांत फैन
कुमार: ओके राज…

प्रगति ( कहानी अपनापन तोडती हुई प्रगति की )

वो बिखरी हुई टॉफी बिस्किट की दुकान हुआ करती. सुबहें की डबल रोटी के पैकेट से धूल झाड कर खरीदना पड़ता था. वो तक़रीबन तक़रीबन बुढ़ापे में आ चुके अंकल भी साफ़ सफाई का बिल्कुल ध्यान नहीं रखते. काफी बार तो गुस्सा भी आ जाता है दुकान की हालत देख कर. मन ही मन मन करता की नहीं लेना बूढ़े से सामान फिर अगली दुकान की तरफ बढ़ते कदम फिर से उसी दुकान पर घूम जाते.
“ यार ताऊ कब का पैकेट हैये ... ??? “ “ अरे परसों ही तो माल आया है .... मजाक करता है कब का पैकेट है “
और अक्सर मैं आइसक्रीम रखने वाले फ्रीज पर बैठ जाता और फिर हम सामान्य ज्ञान की बाते करने लगते. उसे बीच “बीच-बीच” में बीडी, पेप्सी लेने आने वाले पडोसी भी कुछ देर ठहर कर फिर ताऊ से सामान और मजे लेकर जाया करते.
आज भी उसी दुकान के सामने से निकलता हूँ. शीशे से ढकी उस दुकान अन्दर ऐ.सी. लगे हुए है साफ़ सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है. आज ताऊ ने एक बड़ी आइसक्रीम कंपनी की फ़्रेचैसी ले ली है. और सब कुछ बड़े ही सभ्य और बेहतर तरीके से हो रहा है उस दुकान में.
लेकिन अब वो दुकान हमारी गली के बहुत से लोगो की पहुच से बाहर हो गयी है. जो लोग तकरीबन रोज़ ही पहुँच जाया करते 2 पल बतला…