प्रगति ( कहानी अपनापन तोडती हुई प्रगति की )



वो बिखरी हुई टॉफी बिस्किट की दुकान हुआ करती. सुबहें की डबल रोटी के पैकेट से धूल झाड कर खरीदना पड़ता था. वो तक़रीबन तक़रीबन बुढ़ापे में आ चुके अंकल भी साफ़ सफाई का बिल्कुल ध्यान नहीं रखते. काफी बार तो गुस्सा भी आ जाता है दुकान की हालत देख कर. मन ही मन मन करता की नहीं लेना बूढ़े से सामान फिर अगली दुकान की तरफ बढ़ते कदम फिर से उसी दुकान पर घूम जाते.

“ यार ताऊ कब का पैकेट है  ये ... ??? “
“ अरे परसों ही तो माल आया है .... मजाक करता है कब का पैकेट है “

और अक्सर मैं आइसक्रीम रखने वाले फ्रीज पर बैठ जाता और फिर हम सामान्य ज्ञान की बाते करने लगते. उसे बीच “बीच-बीच” में बीडी, पेप्सी लेने आने वाले पडोसी भी कुछ देर ठहर कर फिर ताऊ से सामान और मजे लेकर जाया करते. 

आज भी उसी दुकान के सामने से निकलता हूँ. शीशे से ढकी उस दुकान अन्दर ऐ.सी. लगे हुए है साफ़ सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है. आज ताऊ ने एक बड़ी आइसक्रीम कंपनी की फ़्रेचैसी ले ली है. और सब कुछ बड़े ही सभ्य और बेहतर तरीके से हो रहा है उस दुकान में.

लेकिन अब वो दुकान हमारी गली के बहुत से लोगो की पहुच से बाहर हो गयी है. जो लोग तकरीबन रोज़ ही पहुँच जाया करते 2 पल बतलाने के लिए अब दुकान पर लगे शीशे शायद उसे रोक रहे है. दुकान में लगा ऐ. सी. अब सांसे रोकने लगा है.

या कुल मिला कर कहे तो जैसे ही उनकी दुकान सिस्टेमेटिक ही है तभी से ही लोगो की दूरियां बढ़ने लगी है.

और इस वाक्या से अपने को एक चीज ये समझ आई की हमेशा

प्रगति जोड़ती नहीं है काफी बार जिसे हम तरक्की  कहते है वो लोगो को दूर भी कर देती है


सभी को राम राम

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