कर्ण और विभीषण ( एक सार - एक कहानी )




बैठे बैठे सोच का दायरा हिन्दू धर्म के दो प्रमुख कृत्य महाभारत और रामायण पर जा पंहुचा. इनमे सबसे ज्यादा ध्यान दो किरदारों ने अपनी तरफ खीचा. जो थे महाभारत के दानवीर कर्ण और रामायण के विभीषण.

मैं समझने की कोशिश कर रहा था की हमारा समाज किस प्रकार से चीजो को दो तरफ़ा देखता है समझता है.

इसी सन्दर्भ को समझने के लिए हम मान लेते है की भगवान् जो करते है हमेशा अच्छाई और सच्चाई के लिए करते है और इसी के साथ ध्यान करते है इन दोनों किरदारों का.

जब महाभारत का रण चल रहा था तो शक्तिशाली योद्धा दानवीर कर्ण भगवान् और पांड्वो के खिलाफ खड़ा था. कर्ण का एक मात्र धेयेय था अपने मित्र दर्योधन के हक़ में लड़ना. कर्ण जानता था की वो बुराई के साथ खड़ा है फिर भी वो भगवान् के खिलाफ़ लड़ा और समाज में आज भी उसे देव समान इज्ज़त मान प्राप्त है.

और सिक्के के दुसरे पहलु को देखते है की विभीषण ने अच्छाई का साथ दिया और अपने बुरे भाई रावण को मारने का भेद राम को बताया हालांकि विभीषण ने सच्चाई का साथ दिया पर समाज आज भी उसे धिक्कार भावना की नजरो से देखता है.

तो क्या इन दोनों किरदारों से हमे ज्ञात नहीं होता की अच्छाई या बुराई हम किसी के भी साथ खड़े हो खड़े हमे शिद्दत के साथ रहना चाहिए.

बस ऐसे ही ख्याल किसी सफ़र पर निकल आये

राम राम 

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