परिंदों के आरमान



बेहद सुलझी हस्ती लिए वो शख्स काफी सरल ही रहता था. दिमाग पर लोड नाम की कोई चीज़ नहीं. खाना पीना ऐश करना शायद इन्ही के लिए परमात्मा ने उसे धरती पर भेजा था.

वैसे तो उस शख्स को में बोहोत थोड़े समय के लिए जान पाया लेकिन उसके दोस्तों के साथ उसके संबंधो के देखते हुए ये समझने में बिल्कुल समय नहीं लगा की ये बंदा तो विरला ही है. ना दिखावा, ना ढोंग, ना खामखाँ की हवा बाजी बस दिल की बात तुरंत जबान पर. शायद यही उसे अपनी तरह का एक प्राणी बनती थी.

लेकिन ये उम्र जवान !!! ये जवानी कमबख्त होती ही ऐसी है. ना जाने कितनी बीमारीया लेकर आती है. ना जाने कितने ही युवाओ को लील गयी ये जवानी की बीमारी. ना जाने कितनो का दिन का चैन और रातो की नींद हराम की है इस बीमारी ने. वो भी जवान था कितना बचता इस रोग से.

अचानक से आये उसके बर्ताव के परिवर्तन को मैं पहचान नहीं पाया. जब भी मिलता जल्दी में मिलता. और कहता काम है कुछ फुर्सत में आता हूँ. खड़े होकर आधा आधा घंटे बात करने की जगह 2 मिनट के हाल चाल पूछने ने ले ली. उसके साधारण चलने की गति भी ऐसी हो चली थी जैसे सीटी देने के बाद रेल की तरफ बढ़ते लोगो की हो जाती है. जब भी दिखता नज़रे मोबाइल में गाड़े दिखता.

फिर एक शाम मैंने उसे पकड़ ही दिया. खाना खाते खाते मैंने उस से पूछा
 “ क्यों भाई कोई लड़की वडकी पसंद आई क्या...?? “
“ भाई हमारे पसंद आये से क्या होता है...हम भी तो पसंद आने चाहिए“  जवाब मिला.

उसके जवाब में काफी दर्द और गहराई थी जिसमे उसे छोड़ते हुए मैंने काजू मिक्स पर ही कंसंट्रेशन किया.

गुज़रते दिनों के साथ उस बीमारी विकराल रूप लेना शुरू कर दिया. सुबहे सुबहे भी आँखों में नींद !! लेकिन नजरे मोबाइल पर. राह चलते खम्बो को टक्कर मारने की नोबत आ गयी. अब मैंने भी उसे उसके हाल पर रहने देना शुरू कर दिया. जब भी मिलते तक़रीबन हम एक साथ ही बोलते.
“और ???” मैं
“और ...?? “ वो
“बढ़िया .!!!! “ मैं
“बढ़िया ....!!!” वो

लेकिन इक रोज वो राह में मुझसे फिर टकराया. उसका आई कार्ड भी गायब. लेकिन आज वो बड़ा खुश खुश सा लग रहा था.
“मान गयी लगता है “ मैं मन ही मन सोचा.
“मेरा ट्रान्सफर हो गया है मैं चंडीगढ़ जा रहा हूँ “ उसने बड़ी सी मुस्कराहट से कहा.
“अरे बढ़िया भाई” मैंने कहा

हम उस शाम एक साथ खाने पर गए और वो आखरी बार था जब मैं उससे मिला या कहे की उस से बात हुई. आज कुछ साल बीत चुके है लेकिन उसकी कोई खोज खबर नहीं. उसके कुछ जिगरी दोस्तों से पूछा तो उन्होंने बताया की उसने फ़ोन रखना छोड़ दिया है. और वंहा ऑफिस से भी बिना बताये गायब है.

कुल मिलकर ये था की भाई भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन में वैज्ञानिक. लेकिन इस UPSC नाम की बीमारी ने उसे भी रोगी कर दिया. रिजाइन करने की बाते करने लगा था. प्यार में शायद नींद नहीं आती होगी मगर ये UPSC तो कमबख्त नींदे उड़ा देती है. भरी जवानी में अंकल बना देती है. अभी कुछ दिनों पहले लेटेस्ट अपडेट ये था की उसका प्रीलिम्स क्लियर हो गया था. और आगे वो जाने या परमात्मा जाने.

लेकिन एक बात तय है की परिंदों के आरमान अक्सर अम्बर नहीं देखा करते.

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