शहर में बस्ता गाँव

August 12, 2018


छोटे क़स्बे आज भी ऐसे हुआ करते है जिनमे शहर और गाँव दोनों की जड़े बस्ती है. वैसे तो बढ़ती टेक्नोलॉजी ने जीवन में बोहोत कुछ बदला है मगर अब भी तेजी से बढ़ते डिजिटल इंडिया में एक पुराना भारत बस्ता है.

 
इतवार का दिन पा कर तस्सली से दूध लेने आज हमारे बिल्लू अंकल के इधर जाना हुआ अक्सर तो माता जी ही ये जिम्मेदारी संभालती है. मगर कभी कभी मैं भी डोली हाथ में लिए निकल लेता हूँ.


एक बात तो है की जब आप तकनीक और जीवन की भीड़ भाड़ से उब जाते है तब कही ना कही इन बसते हुए गांवों में उपलों से सजी ये दीवारे भी कही ना कही हुसैन साहब की पेंटिंग जैसी प्रतीत होती है.

पशुओ के इस खाने को न्यार कहा जाता है 

गाय भैंसों को अक्सर मोटी लोहे की चैन से बाँधा जाता है ताकि वो कही इधर उधर ना निकल ले 


अंकल हर बार की तरह खाट पर बैठे हुक्का सिल्गाये टीवी पर चल रही हरयाणवी रागनी सुन रहे है
“ राम राम अंकल”
“राम राम भाई गोला कई दिनों में आया आज “
“बस अंकल ऐसा ही है “

ये कहते हुए में घर के अंदर चला गया जंहा आंटी माटी के चूल्हे को लेप कर शाम के खाने के जुगाड़ में लगी है.

“राम राम आंटी “
“राम राम भाई गोला तेरी मम्मी ना आई आज”
“ना आंटी “



पिछले 15 साल से हम लोग बिल्लू अंकल से ही दूध लेते आ रहे है शायद हम छठी सातवी में रहे होंगे तब से !! जब दूध 12 – 13 रुपे किलो हुआ करता था.



अंकल आंटी के दो लड़के है जो मुझ से उम्र में काफी छोटे है मगर जातीय कर्तव्यों के चलते उनकी जल्दी शादी हो गयी. तो जैसे ही में अंदर जाने लगा तब भैंसों को बहार बांधने आती हंसा की मिस्सिज एक दम से पल्ला करने लगी. कसम से बड़ा गन्दा फील हुआ यार. एकदम बड़े बूढों वाली फीलिंग आई.



ये बात दावे से कही जा सकती है की आप कितने ही लोगो से फेसबुक-whatsapp पर जुड़ जाओ या कितना ही ऑनलाइन सामान खरीद लो. मगर दिल का जुडाव और 3 किलो दूध होने के साथ 1 गिलास फालतू दूध टेक्नोलॉजी कभी नहीं दे पायगी.


यदि आप को भी लगे मौका गाँव जाने का और मिलने का बसते किसी भारत से तो छोड़ियेगा नहीं हुजुर.

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