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Showing posts from September, 2018

इक सफ़र सामर्थ्य का

कहा जाता है की इंसान को अपनी औकात के हिसाब से सपने देखने चाहिए और पैर उतने ही पसारो जितनी आपकी रजाई हो. लेकिन कमब्खत ये समाज क्या जाने जब सपने पाले जाते है तो आसमान की ऊचाई नहीं देखि जाती.

बचपन के याद खाने से इक किस्से का जिक्र करना चाहता हूँ. शायद वो कॉलेज का दौर था नये नये बच्चे जब कॉलेज की देहलीज तक पहुचते है तो हज़ारो सपने और हज़ारो उमीदे लिए पहुँचते है. कुछ बनने के लिए, खुद को सिद्ध करने के लिए की जीवन में हम भी कुछ कर सकते है.

और युवा जीवन की सबसे बड़ी समर्थता सिद्ध करने के तरीके भी अलबेले ही होते है. बड़ी गाडी, बड़ी कोठी, नौकर चाकर और विदेशी छुट्टीया. केवल इन्ही से हम सिद्ध कर सकते है की हम कामयाब है.

तो इक दिन मैं और मेरा मित्र पवन ट्रेक्टर की घांस फूस से भरी ट्राली में लोड होकर जा रहे थे. हम दोनों बैठे बैठे बाते कर रहे थे की हमसे कुछ उचाई पर हवाई जहाज उड़ रहा था. उसकी आवाज कुछ इतनी थी की हमारा ध्यान भटक गया. काफी चमक रहा था वो धुप की रौशनी भी उस से टकराकर आँखों को चुभ रही थी.

तब मैंने हवाई जहाज को देखते देखते पवन को कहा " पवन यार एक दिन जरुर में हवाई जहाज में बैठूँगा वो भी बि…

इक मुस्कान ख़ामोश सी

रोज की तरह शाम के 6:00 बजे मैंने फोन लगाया. घंटी तो गई लेकिन किसी ने उठाया नहीं.
मैं फिर से चाय की चुस्कियां लेने लगा. और 5 मिनट बाद फिर से फोन लगाया... “ भाई अभी कुछ दिन मैं नहीं आ पाऊंगा”  और उन्होंने फोन काट दिया.
तब मैं सड़क के दाहिनी ओर देखते हुए गुडगांव जाने वाली बस की इंतजार करने लगा.
काफी दिन गुजर गए है उस बात को जब सत्यवान भाई साहब से बात हुई थी और आज जाते हुए अचानक उनकी कैब भी
दिखाई पड़ी.

मैंने कहा “ जीतू भाई साहब यह सत्यवान भाई साहब है ना???” उन्होंने गहराई से बाई और देखा और कहा "हां यार सत्यवान ही है... आ गया क्या...!!!"

मैंने पूछा जीतू भैया “ काफी दिन हो गए सत्यवान भाई साहब छुट्टी पर थे क्या”

जीतू भैया "तुझे नहीं पता क्या ...??? "
मैं : "क्या .... मुझे तो कुछ नहीं पता ...!!!"

“अरे भाई इनका एक बड़ा भाई था जो उस दिन हम जा रहे थे तब गाडी चला रहे थे... मुझे याद दिलाते हुए जीतू भाई साहब बताने लगे". हाँ हाँ ... मुझे भी धुंधला धुंधला याद आने लगा.

अच्छा क्या हुआ तो मैंने गंभीरता से पूछा..