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इक सफ़र सामर्थ्य का


कहा जाता है की इंसान को अपनी औकात के हिसाब से सपने देखने चाहिए और पैर उतने ही पसारो जितनी आपकी रजाई हो. लेकिन कमब्खत ये समाज क्या जाने जब सपने पाले जाते है तो आसमान की ऊचाई नहीं देखि जाती.

बचपन के याद खाने से इक किस्से का जिक्र करना चाहता हूँ. शायद वो कॉलेज का दौर था नये नये बच्चे जब कॉलेज की देहलीज तक पहुचते है तो हज़ारो सपने और हज़ारो उमीदे लिए पहुँचते है. कुछ बनने के लिए, खुद को सिद्ध करने के लिए की जीवन में हम भी कुछ कर सकते है.

और युवा जीवन की सबसे बड़ी समर्थता सिद्ध करने के तरीके भी अलबेले ही होते है. बड़ी गाडी, बड़ी कोठी, नौकर चाकर और विदेशी छुट्टीया. केवल इन्ही से हम सिद्ध कर सकते है की हम कामयाब है.

तो इक दिन मैं और मेरा मित्र पवन ट्रेक्टर की घांस फूस से भरी ट्राली में लोड होकर जा रहे थे. हम दोनों बैठे बैठे बाते कर रहे थे की हमसे कुछ उचाई पर हवाई जहाज उड़ रहा था. उसकी आवाज कुछ इतनी थी की हमारा ध्यान भटक गया. काफी चमक रहा था वो धुप की रौशनी भी उस से टकराकर आँखों को चुभ रही थी.

तब मैंने हवाई जहाज को देखते देखते पवन को कहा " पवन यार एक दिन जरुर में हवाई जहाज में बैठूँगा वो भी बिज़नस क्लास में "

पवन: " रहने दे तू ..क्या बैठेगा हवाई जहाज में ... पता है कितना महंगा होता है अपने बस में ही घूम ले "

ये पहली बार था जब किसी ने सीधा सीधा औकात को चेलेंज किया था.

आज उन बातो को लगभग आठ साल हो चुके है और मैं 30 से भी ज्यादा हवाई यात्रा कर चूका हूँ. लेकिन हर बार प्लेन में चढ़ते हुए अपने दोस्त पवन को याद करता हूँ. और अक्सर मन ही मन कहता हूँ " पवन 10, पवन 16, पवन 26, कितना सुकून देता है उस काम को करना जो लोग कहे की तुम नहीं कर पाओगे.

एक ट्रैवलर होने के भी अनेको नुकसान है की सपने बढ़ते चले जाते है, दुनिया छोटी पड़ जाती है और इंतज़ार बढ़ जाता है. अखिल भारतीय स्तर पर देश की लगभग हर ट्रेवल डेस्टिनेशन निपटा चुके है हम. लोगो से मिलना और वहा की संस्कृति समझना भी अपने आप में एक एडवेंचर है जो बखूबी हम करने की कोशिश करते है.

अब इस दिल में जलती लौ प्रचंड रूप से जलने लगी है की चाहे कुछ हो जाये जिन्दगी में एक बार यूरोप जरूर घूमके आना है. मुझे लगता है वो दिन भी ज्यादा दूर नहीं है जब हम स्विट्ज़रलैंड से फोटो डालेंगे और हम से जलने वाले लोग भी लाइक करेंगे मगर अभी नहीं पता की इंतज़ार कितना काटना है. लेकिन होगा जरूर देख लेना .



और हमारे सामर्थ्य को प्ररित करती इस तरह की #SayYesToTheWorld  योजनाए इक दिन जरुर मुक्कमल होंगी.
किस्मत ने चाहा तो जरुर मुक्कमल होगी.



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अलविदा अम्मा

कल रात से ही माहौल गरमाया हुआ था और लोग हॉस्पिटल के सामने, सडको पर और जंहा जगह मिल जाये वंही भगवान को मानाने में लगे हुए थे. पर इस बार ऐसा लग रहा था की भगवान नहीं मानेंगे मगर लोग तो बिचारे भोले भाले होते है.
आज सुबहे 5 बजे अलार्म बजा तो देखा की टीवी चल रहा है और साथ वाले पलंग पर लेटे लातिश भाई बोले “ AMMA NO MORE YAAR”. मुझे लगा की लातिश भाई भी अम्मा के हार्डकोर फैन है. वैसे भी अपन को या कहे की सभी को पहले से ही आईडिया हो गया था की ज्यादा टाइम है नहीं अम्मा के पास. आज सारा दिन चर्चा का मुद्दा रही अम्मा टीवी, लोग, सड़क जहा देखो अम्मा ही अम्मा हो रही थी. मुझे तमिल नाडू का राजनीती तंत्र अजीब या कहे व्यक्ति केन्द्रित लगता है यहाँ के लोग राजनेताओ को भगवान का दर्जा देते है. नेताओ द्वारा अम्मा के पैर छूने की बात तो जग जाहिर है. कहा जाता है की शादी के टाइम लोग जयललिता जी की बड़ी सी मूर्ति आशीर्वाद देते हुए लगते है जिसमे हाथो से अम्मा फूल बरसाती है. मतलब अम्मा को भगवान का दर्जा है.


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अम्मा ने गरीबो …

Life @ MRK

इस पोस्ट का मकसद किसी भी तरह से कॉलेज की प्रशंसा या बुराई करना नहीं है. ये पूर्ण रूप से व्यक्तिगत विचार है अगर ये विचार किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु के विचारों से मेल खाते है तो उसे महज संयोग और मेरा दोस्त कहा जायगा.
हरियाणा के दक्षिण में बसे शहर रेवाड़ी से 7 किलोमीटर दूर खेतो के बीचो बीच उगे इस कॉलेज को “ MATA RAJ KAUR INSTITUTE OF ENGINEERING & TECHNOLOGY “ नाम से जाना जाता है.बनावट के हिसाब से ठीक ठाक ज़बरदस्त, स्टाफ के हिसाब से भी कुल मिला के बढ़िया. सुविधाओं के लिहाज से अच्छा कहा जा सकता है. खेतो के बीच में बसे होने के कारण लडको को कॉलेज से फरार होकर पिक्चर देखने जाने में काफी परेशानी उठानी पड़ती है. कभी कभी तो कॉलेज से भागे लड़के ऑटो ना मिलने की वजह से वापिस कॉलेज ही आ जाते है. कॉलेज की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा हरयाणा के बहार के लौंडो का भी होता है. जो थोड़े दिन में हरयाणवी बोलते देखे जा सकते है. अब काफी लोगों के मन में सवाल आया होगा की लड़कियाँ कैसी है भाई तो अपना जवाब है जैसा देखने वाला देखे. बाकि अपन को तो कोई खास लगी नहीं.


अब सब सोच रहे होंगे के ये सब क्यों बताया जा रहा है तो लिजीये …

A PHOTOGRAPHIC VISIT TO HARYANVI CULTURE

शहीद

शहीद PDF 



वो रोज धमाके सुनते है
जीते हैं जंग के साये में
वो खडे हुए हैं सीमा पर
ले असला अपनी बाहों में

गोलियों की बरसात में
वो लाल लहू से नहाते हैं
होली हो या दिवाली हो
सब सीमा पर ही मनाते हैं

इक आस जो घर पर जाने की
जो पल भर में धुल जाती है
सीमा पार से आकर गोली
साथी को डंस जाती है

फिर कहते हैं इस हालत में
हम घर को जा सकते नहीं
सर कटा सकते हैं लेकिन
सर झुका सकते नहीं
फिर खून खौल सा जाता है
रह रह कर गुस्सा आता है
वो घुंट लहू का पीते हैं
मर मर कर फिर भी जीते हैं

इस वतन चमन के खातिर
अपनी जान देश पर वार गए
खाकर गोली सीने पर वो
सीधे स्वर्ग सीधार गए

सजा तिरंगे में अर्थी‎ जब
घर पर लाई जाती है
याद करा कर कुर्बानी
गोलियां चलाई जाती हैं

सरकारी दलाल भी आते हैं
शहादत गिनाई जाती है
लाख रुपे का चैक दिखा कर
फोटो खिचवाई जाती है

बस इतना सा ये किस्सा है
बस इतनी सी ये कहानी है
ना इनका कोई बुढ़ापा है

सलाम ना आया

सलाम ना आया (PDF)




थी गुफ़्तगू इक आने के उसकी ढल चला आफताब पर पैगाम ना आया
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“दीप” हुआ बदनाम सारे इस जंहा में  पर उस बेवफा का कही नाम ना आया
प्रदीप सोनी 

IAS सोनू

रात का वक्त हो चला है. डिम रोशनी में जलते उसबल्ब को देखता सोनू भयंकर सोच में है. अब शायद रिश्ता साजुड़ चला है उस जीरोवाट केबल्ब के साथ. ना जाने कितनी ही रात उसने उस बल्ब के साथ बातें की हैं.



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घर से आती उम्मीदों वाले फोन पर जब पूछा जाता कि बेटा पढ़ाई कैसे चल रही है. तो एक क्षण को सोचकर सोनू बोलता पढ़ाई तो अच्छी चल रही है माँ पर टाइम का नहीं मालूम कैसा चल रहा है.
जब छोटी बहन बोलती है कि " भैया इस राखी पर मुझे आप की लाल बत्ती वाली गाड़ी चाहिए ". फिर भी सोनू खामोशी से दबी आवाज़ में “हां” कर देता है.

पिता जी से अक्सर बात…

मेरे गुरु है नमन तुम्हे

दूर तलक था अँधियारा
जब जीवन का आगाज हुआ

अनजाना सफ़र अनजानी डगर
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जो मिले आप तो मिला साथ
किसी धुन का जैसे साज हुआ

इस ज्ञान डगर पर चलने से
मुझे जीने का अंदाज हुआ

बन दीप गुरु जब आप जले
तो रोशन ये संसार हुआ

हे मेरे गुरु है नमन तुम्हें
मेरा धन्य जीवन आज हुआ


प्रदीप सोनी

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