भगवान नहीं दिखे




इस बात को तक़रीबन 10 साल गुजर चले है मगर आज भी जब ये किस्सा याद करता हूँ तो आँखों में चमक और होठो पर हंसी लहर सी जाती है.

वो शनिवार की दोपहर में सचिन ने एकाएक बुलाया और कहा “आज खाटू श्याम जी के चले क्या..?” हम चाचा – ताऊ के  बालको का गुट अगले आधे घंटे में तैयार था. निकलने से पहले 10 मिनट में यात्रा का सारा खांचा तैयार हो गया और खाने पीने का माल बिस्कुट भुजिया इकठा कर लिया गया.  निकलते निकलते वक्त शाम के 5 का हो चला था और 5 :30 होते होते हम विचित्र प्राणियों से भरी हुई मारुती 800 दिल्ली से खाटू शाम जाने वाले हाईवे पर पूर्ण रफ़्तार से चल रही थी.

ये वाक्या मेरे जेहन में इसलिए भी ज्यादा घर करता है क्युकी घर वालो की अनुपस्थिति में ये मेरे जीवन की पहली यात्रा थी तो मैं काफी खुश और रोमांचित महसूस कर रहा था. राजस्थान में घुसते ही एक शानदार ढाबे पर गाड़ी लगी और हम लोग खाने पर टूट पड़े इतना तो ध्यान है की पेट फटने तक खाना खाया था.

लम्बी दूरी होने के कारण हमारे फर्नान्डो अलोंसो (सचिन) और माइकेल शुमाकर (कालू) स्टीयरिंग बदल बदल के गाडी चला रहे थे. गाडी में बजते गाने और फटी हुई आवाज में पीछे पीछे गाते हम, ढलता सूरज, ख़ाली सड़के और हवा में उठती मिट्टी की भीनीं भीनी खुशबु सब कुछ तो था इस सफ़र में यादगार बनाने लायक.

एकाएक हमारी गाडी एक पेड़ के पास रूकती है और अगले ही क्षण हम लोग हाथ में पत्थर लिए पेड़ पर लगे आम पर निशाना लगा रहे थे. अपने निशानों में असफल हम लोग कोशिश कर ही रहे थे की दूर से रजिस्थानी पगड़ी पहने हाथ में लट्ठ लिए आता बड़ी बड़ी मूछो वाला ताऊ गाली उच्चारण करता हुआ आ रहा था...तुम्हारी माँ की....तुम्हारी बहन की .....ये देख हम लोग तुरंत सेकंड के हिसाब से गाडी में पैक होकर स्टीयरिंग घुमा दिए और निकल लिए.

खाटू श्याम पहुँचते पहुँचते अब रात हो गयी और हमारा सफ़र भी धर्मशाला पहुँच कर आ थमा था. धर्मशाला में होते भगवान् के मधुर भजन सुनकर आनंद आ रहे थे और भजन पूर्ण होने के बाद हम लोग अपने कमरे में गए आधे घंटे हद मजाक किया और थक हार कर सो गए.

भोर के चार हो चुके थे और कोई भी उठ कर राजी नहीं और आज तो वैसे भी पूजा का विशेष दिन होने के कारण भीड़ भी हद से ज्यादा होने की सम्भावना. इसलिए मौके की नजाकत को समझते हुए हम लोगो ने उठ कर नहाना धोना ख़तम किया और 5 बजे तक मंदिर की लाइन में जा पहुंचे.

जल्दी चलने के कारण हम लोग लाइन में काफी आगे थे और पीछे हर सेकंड लाइन में सेकड़ो लोग जुड़ते चले गए. और भक्तों की लाइन किलोमीटर की होती जा रही थी. अब वो क्षण आ चूका था जिसके लिए हम घर से इतना दूर आये. अब हम लोग भगवान् जी के समक्ष खड़े थे और पीछे से धक्के मरते लोग और आगे से पकड़ कर खीचते पंडित जी के बीच का जो समय था उसमे भगवान् से क्षमा याचना की और बेहतर भविष्य की दुआएं की गयी. और कुछ ही सेकंड में हम लोग समंदर में बहते तिनके की तरह भीड़ मे बह कर बहार आ पहुंचे.

दर्शन के बाद अब राजस्थान की मशहूर कढ़ी कचोरी चल रही थी और अपने दर्शान के बारे में बतला रहे थे कोई कह रहा “बहुत बढ़िया दर्शन हुए” तो कोई कह रहा “जल्दी जल्दी में दर्शन हुए” और सब लोग कढ़ी कचोरी में मस्त थे. की अचानक आवाज आई “और गोलू तेरे कैसे दर्शन हुए...?” गोलू कुछ सेकंड ठहरा और बोला  “ भाई मेरा चश्मा कार में ही रह गया था मुझे तो भगवान् ही ना दिखा” ये सुनते ही हम सब लोगो में हंसी फट पड़ी और कालू के तो बिचारे के कढ़ी भी नाक से निकल आई हंसी के मारे.

आज भी जब ये वाक्यात याद करता हूँ तो मुस्कान अपने आप होठो पर छा जाती है. और एक बात ये भी कहना चाहता हूँ की इंसान के जीवन की असली कमाई बेहतरीन यादे ही होती है. जिसे याद करके इंसान हस लेता है चाहे वो जीवन का कोई भी दौर हो. इसीलिए दोस्तों किसी को कुछ देना हो तो अपना वक़्त दीजिये और यादे दीजिये ताकि आप रहे ना रहे मगर आपकी याद उस आदमी के जीवन में सदा बनी रहे.



Comments