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भटकती आत्मा



रात के तक़रीबन दस बज चुके थे और रेल अपने समय से करीब 1 घंटा देरी से स्टेशन पहुंची. धीरे धीरे जैसे ही ट्रेन के चक्के रुके तो रेल में खड़े लोगो ने दरवाजे पर खड़े लोगो को धक्का मारना शुरू कर दिया ताकि घर जाने के लिए कोई टेम्पो, ट्रक का जुगाड़ हो जाए. जैसा की आप जानते है की छोटे शहरों में तो रात के दस बजे ही आधी रात घोषित कर दी जाती है और सडको पर घोर शांति पसर जाती है.

अब सवारियों से लगने वाले धक्को से परेशान मैं ट्रेन की सीट पर फिर बैठ गया झल्लाते हुए “सालों तुम मरो पहले हमारी देखी जायगी”. अब धीरे धीरे सारी भीड़ निकल गयी और मैं आराम से अपना पिट्ठू बैग लिए फ़िल्मी स्टाइल में उतरा. और धीरे धीरे स्टेशन की एग्जिट गेट की तरफ निकला. लकिन वहा तो घोर सन्नाट था ना ऑटो, ना रिक्शा, ना ट्रक, ना हवाई जहाज. चारो तरफ शांति ही शांति थी अब मैं अपने आप को कोस रहा की “ओर बैठ ले सीट पे ... बन ले महाराजा...आराम से उतुरुंगा “ की इतने में दूर से आते इक ऑटो की आवाज कानो में सुनाई पड़ी. और देखते ही देखते ऑटो सामने आ रुका और भाई ने बैकग्राउंड में बजते हुए गाने की आवाज़ मंदी करते हुए कहा. “हां भाईसाहब कहा जाना है टोरंटो, कैलिफ़ोर्निया , लॉस वेगास, न्यू जेर्सी... ऐसा कहते हुए ऑटो वाला भाई ने हमारे शहर के सारे चौक के नाम बता दिए.

मैं: भाई वाशिंगटन जाओगे ??
ऑटो: हाँ आजाओ बैठो ... पर भाई एक दो सवारी लेकर ही चलूंगा !!
मैं: अरे भाई दो सवारी के पैसे मैं दे दूंगा चल
ऑटो: नहीं मैं तो सवारी ही लेकर चलूंगा
मैं: ठीक है भाई जैसा जी करे तेरा

5 मिनट गुजर गयी मगर कोई सवारी नहीं आई

मैं: अरे चल मामा तू भी आज ही कमाएगा सारी माया
ऑटो: बस एक मिनट और भाईसाहब

तभी एक कन्या ऑटो में आकर बैठ गयी और ऑटो वाले से बोली
कन्या: भईया वेगास चौक जाओगे ???
ऑटो: हाँ मैडम बैठो ...(और इसके साथ ऑटो वाले ने रेस मार दी )

अब सारी सड़क घोर शांत थी बस एक ऑटो की और दूसरी ऑटो में बजते गाने की ही आवाज गूँज रही थी

 वो कन्या और मैं एक दम शांत सीट पर बैठे हुए थे और मैं तो वास्तव में आखे बंद किये संगीत का आनंद ले रहा था और टेम्पो एक के बाद एक सभी चौक को पार करता जा रहा था
तभी एक दम से आवाज आई “ काटे नहीं कटते दिन ये रात ...कहनी थी जो तुमसे ....” टेम्पू में बजने लगा.
मौके की नजाकत को समझते हुए ऑटो वाले भाई ने आवाज तुरंत प्रभाव से मंदी कर दी फिर गाना बंद कर दिया
तब जाके साँस में सास आई

अब वेगास चौक कुछ ही दूरी पर था की कानों में एकाएक ध्वनि पड़ी

कन्या: हेल्लो आपका नाम क्या है ??
मैं: प्रदीप
कन्या: नाईस टू सी यू

“लो मैडम वेगास आ गया” टेम्पू वाले ने कहा और वो उतर कर वेगास चौक की अँधेरी गली में लुप्त हो गयी

उस से अगले  स्टॉप वाशिंगटन उतर कर मैं जेब में हाथ डाले यही सोचता जा रहा था
“ये क्या हादसा था भाई रे...समझ सा नहीं आया.... लगता है कोई आत्मा वात्मा होगी  

पर इस घटना से एक बात समझ आई की जीवन में कुछ चीज़े हो जाती है अलग ....अचानक !!!

बाकी स्वादों में जिन्दगी है और जिन्दगी में स्वाद है ..... राम राम

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Life @ MRK

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पेपर और धक्के

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शहीद

शहीद PDF 



वो रोज धमाके सुनते है
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गोलियों की बरसात में
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जो पल भर में धुल जाती है
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फिर कहते हैं इस हालत में
हम घर को जा सकते नहीं
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मर मर कर फिर भी जीते हैं

इस वतन चमन के खातिर
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खाकर गोली सीने पर वो
सीधे स्वर्ग सीधार गए

सजा तिरंगे में अर्थी‎ जब
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सरकारी दलाल भी आते हैं
शहादत गिनाई जाती है
लाख रुपे का चैक दिखा कर
फोटो खिचवाई जाती है

बस इतना सा ये किस्सा है
बस इतनी सी ये कहानी है
ना इनका कोई बुढ़ापा है

सलाम ना आया

सलाम ना आया (PDF)




थी गुफ़्तगू इक आने के उसकी ढल चला आफताब पर पैगाम ना आया
चढ़ा था सुरूर मय खाने में थे हम पर सदियों से प्यासों का वो “जाम” ना आया
खड़े थे कुचे में इक झलक ऐ दीदार को वो आये नज़र मिली पर सलाम ना आया
मिली बदनामिया और मिली शौहरते पर हसरतों वाला दिली मुकाम ना आया
उसका था शहर और उसकी अदालते हम हुए हलाक उसे इल्जाम ना आया
“दीप” हुआ बदनाम सारे इस जंहा में  पर उस बेवफा का कही नाम ना आया
प्रदीप सोनी 

IAS सोनू

रात का वक्त हो चला है. डिम रोशनी में जलते उसबल्ब को देखता सोनू भयंकर सोच में है. अब शायद रिश्ता साजुड़ चला है उस जीरोवाट केबल्ब के साथ. ना जाने कितनी ही रात उसने उस बल्ब के साथ बातें की हैं.



आज शुरू होते ही खत्म हो जाने वाले इस कमरे में पूरे 2 साल हो चुके हैं. 2 साल हो चले हैं एक उम्मीद को पालते हुए. और हो चले हैं 2 साल इक सपने को जीते जीते.आज बात हो रही हैबल्ब सेकि किस कदर बीते हैं 2 साल.अब भी याद है जब वहउम्मीदों की पोटलीलिए दिल्ली आया था. चेहरे पर लाली और जुल्फें एकदम तेरे नाम के राधे भैया जैसी. पर अब 2 साल बाद राधे भईया वाली जुल्फे मनीष सिसोदिया के बालों में बदल चुकी हैं. 2 साल पहले वाला बाका सोनू हिंदी फिल्मो वाला लाला बन चुका है.पेट आ गयाहै सोनू को.
घर से आती उम्मीदों वाले फोन पर जब पूछा जाता कि बेटा पढ़ाई कैसे चल रही है. तो एक क्षण को सोचकर सोनू बोलता पढ़ाई तो अच्छी चल रही है माँ पर टाइम का नहीं मालूम कैसा चल रहा है.
जब छोटी बहन बोलती है कि " भैया इस राखी पर मुझे आप की लाल बत्ती वाली गाड़ी चाहिए ". फिर भी सोनू खामोशी से दबी आवाज़ में “हां” कर देता है.

पिता जी से अक्सर बात…

मेरे गुरु है नमन तुम्हे

दूर तलक था अँधियारा
जब जीवन का आगाज हुआ

अनजाना सफ़र अनजानी डगर
मकसद जीवन का राज हुआ

जो मिले आप तो मिला साथ
किसी धुन का जैसे साज हुआ

इस ज्ञान डगर पर चलने से
मुझे जीने का अंदाज हुआ

बन दीप गुरु जब आप जले
तो रोशन ये संसार हुआ

हे मेरे गुरु है नमन तुम्हें
मेरा धन्य जीवन आज हुआ


प्रदीप सोनी

भारतीय माँ के हथियार

भारतीय माँ के हथियार