झरोखा भाग - 1

झरोखा एक फोटो-कैप्शन सीरीज है जिसमे सभी फोटो और कैप्शन लेखक की रचना है

दोस्ती किताबो की बढ़िया जो कह कर बात बदलती नहीं  

जिन्दगी के सफ़र मे जाम अटल है फसो तो गाना बजाओ भोपू नहीं 

इंतजार तपस्या है और रेल फल  

सुकून के लिए जरूरी नहीं हिमालय जाया जाय ढ़लती शाम और खाली पार्क भी सुकून से कम नहीं 

उन्हें देख कर आ जाती है चेहरे पर रौनक
वो कहते है बीमार का हाल अच्छा है 


रंग भेतरे जिन्दगी में पर देखने का नजरिया चाहिए जनाब 

कुछ ऐसा करो की नाम हो जाये
चलो ईट का भट्टा खोला जाए 

आँख हो या धरती बारिश के बाद खिल सी जाती है  

लम्बे सफ़र में  ऐ दोस्त तेल और चाय कम नहीं होनी चाहिए 

शायद शास्त्रों में चुल्लू भर पानी इसे ही कहा गया है  

वक़्त वक़्त की बात है दीप कब महाराजा पानी बेचे कौन जाने   

GST और नोटबंदी पर चर्चा करती भैंसे  

दुनिया बातो में रस लेती है और तितली फूलो में  


ये लाइन लिखने वाले को literature में नोबेल मिलना चाहिए  

ख़ूबसूरती दिल से होती है और शकल से भी   

इ बात सरकार को बिल्कुल नहीं कही गयी    

ये भी एक दौर था चला गया  

ये देख ऐसा प्रतीत हो रहा है  जैसे ये बैल कह रहा हो
"आओ कभी हवेली पे" 

जिन्दगी रंगीन होनी चाहिए और कर्म सफ़ेद 

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