पहला धोखा: 90 के दशक में बचपन होने वाले धोखे




अतित के पन्नों मे देखू तो ये क़िस्सा मेरे साथ जिंदगी मे हुए पहले धोखे की निशानी है.

अपने छोटे से शहर के एक छोटे से स्कूल मे मैं और मेरा भाई जो कि उम्र मे मुझसे तक़रीबन 6 साल बड़ा है एक साथ पढ़ते थे वो शायद छठी या सातवी मे रहा होगा और मैं पहली या दूसरी मे हम उन दिनों स्कूल भी एक साथ आया जाया करते.

वो दिन भी एकदम आम दिनों कि तरह था. छुट्टी कि धंटी बजते ही मैं बहार वाली दर्शन अंकल कि दुकान से 1रूपे वाला OYes का पैकेट लेकर खड़ा हो गया और अरूण के आने का इंतज़ार करने लगा.

कुछ ही मिनटों मे अरूण साईकिल स्टैंड से साइकिल ले दर्शन अंकल कि दुकान पर आ पहुँचा. उसकी चमकीले रंग कि लेडीज़ डिज़ाइन एटलस साइकिल पर बैठ जम हम दोनों आते जाते होंगे तो क़सम से सैंपल लगते होंगे.

असली क़िस्सा अब सुनो.... सब कुछ सही चल रहा था मैं साईकिल कि पिछली सीट पर गद्दी पकड़े हुए बैठा था. शहर के टूटे रोड और साईकिल की पिछली सीट कि पीड़ा वो लोग समझ सकते है जो कभी उस से रूबरू हुए हो.

साईकिल अपनी ही गति से वेगवान थी और चलते चलते अचानक एक ज़ोरदार झटका लगा फिर कुछ सेकेंड के लिए आँखों के सामने अंधेरा छा गया.

जब आँखें खुली तो वो चमकीली साइकिल धराशायी थी. अरूण खड़ा अपने कपड़े झाड़ रहा था और मैं ज़मीन पर बैठा मामला समझने कि कोशिश कर रहा था कि आख़िर हुआ कया है?? तभी मैने देखा कि मेरे जूते साइकल कि चैंन मे फँसकर टूट गये और पैरों से भी ख़ून निकल रहा है.

भाई साहब ख़ून देख कर मैंने जो रोना शुरू किया वो तो देखने वाला ही रहा होगा.

मैं: मेरा पैर तोड दिया तूने
अरूण: मैंने नही तोड़ा पत्थर से टकरा कर गिर गए थे.
मै: मेरे जूते भी फट गए और ख़ून भी आ रहा मेरी मम्मी मारेगी.

अब खुद को फँसता देख अरूण ने मुझे समझाया

अरूण: घर पर बताना कि “मैं पैदल चल रहा था और पत्थर से चोट लग गई”
मैं: नही मैं तो बताउंगा अरूण ने मारी
अरूण: कल टोफ़ी दे दूँगा कह दियों गिर गया था.
मैं: नही मैं तो बताउंगा अरूण ने मारी
अरूण: अगर तूने सच बताया तो कल बहुत मारूँगा

और फिर उसने मुझे सारी कहानी बताई कि मुझे घर कया कया बताना है और हम वहाँ से लड़ भीड़ के चल दिये.

मैं लँगड़ाता हुआ घर पहुँचा.
माँ: ये चोट कहा से लगवा लाया
मैं: पत्थर से टकरा गया चोट लग गई (सुबकते हुए)
माँ: नही ये तो पत्थर कि चोट नही है ...सही बता ???
मै: सही मैं चल रहा था पत्थर पैर पर लग गया गिर गया कमर पर भी लगी.
माँ: नही ये तो साइकल मे पैर आया है ...सही बता??
मैं: नही गिरा ही था अरूण से पूछ लो ??

कुछ देर मे माँ, मैं और अरूण आमने सामने थे.

माँ: कैसे लगी इसके ??
अरूण: चाची साइकल की चैंन मे पैर चला गया इसका.

ये अरूण के शब्द सुनकर मुझे ठीक वैसा लगा जैसे जुलियेट सिजर मे सिजर के दोस्त बरूटस द्वारा छुरा घोपने पर सीज़र ने कहा था यू टू बरूटस”

इसके बाद माँ मुझे ग़ुस्से से घुरे (झूठ बोलने पर)
मैं अरूण कि तरफ़ देख कर रोउ (धोखा देने पर)
और अरूण हम दोनों को नज़र बचाकर देखे.(बचाव मे)

बस ये था पहला धोखा बाकि पैर की चोट गहरी नही थी.


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