एक क़िस्सा: धर्मशाला का आखरी मैच


ये स्कूल काल की बात है साल रहा होगा तकरीबन 2005 -2006 का दौर। हम लोगों का संयुक्त परिवार था और चाचा ताऊ के बच्चे ही हम गिनती मे 12 - 15 हो जाते थे, हमारी की उम्र में तकरीबन 1 से 5 साल का फर्क था कहने का मतलब सभी एक ही उम्र समूह के थे।

हमारे घर के पड़ोस में एक धर्मशाला होती है, आकार में अच्छी खासी बड़ी जिसके एक साइड में सरकारी पुस्तकालय है दूसरी तरफ सड़क और तीसरी तरफ तालाब. इस धर्मशाला में हमारे मुहल्ले और आस पड़ोस के मुहल्ले के शादी ब्याह बारात अक्सर ही इस धर्मशाला में होते थे. ये धर्मशाला गुज्जर समाज की धर्मशाला है और हजारीलाल ताऊ इस की रखवाली करते थे। ताऊ बड़े ही आक्रामक स्वभाव के धनी है और एक पव्वा मारने के बाद मजाल धर्मशाला के आस पास कोई परिंदा भी पर मार जाये। कई बार तो वो ऑक्सीजन को भी धर्मशाला में नहीं आने देते थे.

उस दिन दोपहर के 3 बज चुके थे और हम लोगो का 6 – 6 ओवर का वन डे इंटरनेशनल शुरू हो गया. खेल के नियम बड़े साफ़ है सामने वाली दीवार चौका, बगल वाली दिवार दो रन, अगर बॉल सीधे दिवार पर लगी तो छक्का. इसके साथ ही बॉल अगर बहार गयी तो आउट, बॉल अगर छत पर गयी तो आउट जमा बॉल लानी पड़ेगी और सबसे बड़ा रूल अगर कोई गेट खटखटाए तो बैट बॉल लेकर लाइब्रेरी की दीवार कूद धर्मशाला से बहा. बड़े गेट की अन्दर से कुण्डी बंद होते के साथ मैच शुरू हो गया, समय की तंगी और ताऊ के आने के डर के कारण दिन में केवल 4 से 5 वन डे मैच ही हो पाते थे.

हमने अपने पल्येरों के नाम उस दौर के बेहतरीन खिलाडियों के नाम पर रखे हुए थे जैसे जो तेज़ बॉल फेकता उसका नाम अख्तरस्पिनर का मुरलीधरन और मेरा जैसे युवराज था. अगले दिन भी दरवाज़े को कुण्डी मार के मैच का आरम्भ हो चुका थाये सिलसिला तकरीबन रोज़ का रहता और हम भी नकटे रोज़ पहुँच लिया करते धर्मशाला के ग्राउंड में शायद ही कोई ऐसा दिन होता था जब बिना दीवार कूदे हम घर जाये. और आज तो दूसरे ही मैच में भागना पड़ गया।

अब ये तो अपनी बड़ाई खुद ही करने वाली बात होगी मगर मोहोल्ला क्रिकेट में मैं था और इंटरनेशनल क्रिकेट में विराट कोहली है। खेल बड़ा ही रोमांचक चल रहा था 11 रन पर हमारी टीम आल आउट हो गयी और अपोजिट टीम को 3 ओवर में 2 विकेट रहते 7 रन बनाने थे टक्कर काटे की थी. अगली बॉल पर चौका...और अब मैच हमारे हाथ से निकलते हुए दिखने लगा। अगली बॉल तुक्के से सीधी पड़ गयी और दीवार पर रंग से बनी किल्लियो से जा टकराई अब मैच और भी रोमांचक हो चुका था. मंगू स्पिन बॉल फ़ेकने के लिए आधा किलोमीटर का रनअप लिए भागा आ रहा था. तभी एक दम से दरवाज़े बजे “धप्प धप्प धप्प"

लौंडो जहाँ थे जैसे थे अपने सामान उठा कर दिवार कूद कर धर्मशाला से पार और ताऊ शुद्ध सांस्कृतिक वाचन बोल कर हमे “तुम्हारी माँ की ..... बहन की .....”

इस वाक्या के कुछ दिनों बाद इतवार का दिन था और हम लोग चिंता में थे की आज क्या करे पूरा दिन काटना भारी हो जायगा पार्क में जाओ तो वहां ना खेलने दे धर्मशाला में ताऊ ना खेलने दे करे तो करे क्या. इतने में भागा भागा छोटा गोलू आया.“हज़ारी ताऊ नहीं है बहार गया है '' और अगले दो मिनट में लोंडे धर्मशाला के दरवाज़े पे।

उस दिन हम लोग बड़े खुश थे की आज पूरा दिन खेलेंगे और बैट बॉल लिए धर्मशाला जा रहे थे, तभी कालू बोला देख शोएब अख्तर की बॉल दिखाऊ शोएब अख्तर की और रन अप लेते हुए दीवार की तरफ बॉल फ़ेकने भागा, बॉल वाकई में थोड़ी तेज़ थी लेकिन बॉल आगे बढ़ रही थी किसी और पथ पर, पथ जहाँ बॉल को नहीं जाना चाहिए था और बॉल जा टकराई जहाँ उसे नहीं टकराना चाहिए था. धर्मशाला के संस्थापक के उस फोटो पर बोल जा टकराई और तस्वीर नीचे गिर कर जय बोल गयी. और गिर कर तहस नहस हो गयी अगले ही पल जिस स्पीड से हम अन्दर जा रहे थे उसी स्पीड से वापिस घर हो लिए और पूरे दिन धर्मशाला के आस पास भी नहीं भटके।

अगले दिन स्कूल से हम घर पहुँचे तो हमारे घर में काफी शोर शराबा था जी हां ताऊ हमारे घर वालो को हमारे कर्मो के बारे में बता रहा था और "कह रहा था अगली बार इनमें से कोई भी धर्मशाला में दिख गया तो अच्छी बात नहीं होगी देख लेना"

और इस तरह वो शोएब अख्तर की बॉल हमारे धर्मशाला ग्राउंड की आखिरी बाल रही
अब जब कभी धर्मशाला में शादी ब्याह के प्रोग्राम में जाते तो हजारी ताऊ को राम राम करके संस्थापक ताऊ की फोटो की तरफ देख स्माइल कर देते.”

बस इतना सा था ये किस्सा 


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