सामर्थ्य की जात: एक विश्लेषण




पिछले दिनों दफ्तर में आरक्षण के मुद्दे पर गहन वार्ता चल रही थी .

मैं: आरक्षण  आज की तारिख में उतना जरुरी नहीं जितना उस समय ज़रूरी था जब इसे दिया गया था.
दूसरा भाई: देखो आरक्षण इंसान के पेशे के हिसाब से दिया जाता है जैसा पहले होता था की ब्राहमण पढ़ते पढ़ाते थे, क्षत्रिय लड़ते थे इसी तरह सभी को उनके पेशे के हिसाब से जाती दी गयी और आरक्षण दिया गया.
मैं: तो इसका परिणाम ये तो नहीं होना चाहिए की जो ब्राहमण मेहनत करके 90 % अंक ला रहा है उसकी जगह नौकरी उसे मिल जाये जो -20 नंबर लाया है (राजस्थान में गणित प्रोफ़ेसर की भर्ती में -20 अंक लाने वाले व्यक्ति का चयन हुआ आरक्षण के चलते).
दूसरा भाई: आज भी हमारा समाज जातीय भेद भाव से ऊपर नहीं उठ पाया है हरिजनों को आज भी तिरस्कारा जाता है!!
मैं: मैं बोहोत ऐसे हरिजनों को जनता हूँ जो लम्बी गाडी में घूमते है, फ्री में प्लाट मिलते है, फ्री दाल चावल!!
दूसरा भाई: आप ग्राउंड लेवल पे सोचो “2 परिवार है अड़ोस पड़ोस में एक जनरल का है एक sc का है दोनों के बच्चे एक लड़का और एक लड़की ग्रुप डी की नौकरी कर रहे है तो क्या जनरल वाला sc वाले के घर में कभी शादी करेगा ??”
कभी नहीं करेगा!!!

मैं कुछ क्षण के लिए गहन सोच में पड़ गया

मैं: चलो हम सीन बदल देते है “2 परिवार है अड़ोस पड़ोस में एक जनरल का है एक sc का है दोनों के बच्चे एक लड़का और एक लड़की IAS अधिकारी है तो क्या जनरल वाला sc वाले के घर में कभी शादी करेगा ??”
भाग के करेगा!!!

दूसरा भाई: हम्म वो तो है

और मेरा भी यही मानना है की आज समाज जात पात के आरक्षण से ऊपर उठकर आर्थिक और सामाजिक प्रतिष्ठा के हिसाब से आंकलन करने लगा है. अंत में यदि आरक्षण ना हो तो अच्छा और अगर हो तो आर्थिक आधार पर होना चाहिए क्युकी अंग्रेजी की एक कहावत है
only equals can be friend” और जब तक सभी लोग बराबर नहीं हो जाते तब तक समाज में ऊच नीच का नज़रिया बना रहेगा.

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