क़िस्सा: इक खोएं गीत का


यु-ट्यूब प्लेलिस्ट में रेंडमली बजते हरयाणवी गानों के बीच अचानक. (हलवे हलवे चाल कदे रे.... तेरे ) स्वर कानों में पड़े और एकाएक मुस्कान चेहरे पर दौड़ गयी और आँखे बंद किये हुए दिमाग समय के उस दौर में जा पंहुचा.

कॉलेज के दिनों की वो आधी छुट्टी में वोल्लिबाल बजा क्लास के आखरी बेंच पर आ बैठे थे. मैच खत्म होने के बाद क्लास की वो आखरी दो बेंचे हमारे पसीने सुखाने का ठिकाना होती. क्लास का दरवाज़ा ढाले हम लोग मैच या इधर उधर की बातोँ पर बातचीत करने लगते.

मैं: अरे भाई मटरू गाना बजा दे कोई बढ़िया सा !!
मटरू: बापू ज़मीदार सुन ...... और उसने फ़ोन में गाना चालू कर दिया.
मैं: अरे यार सारा दिन ही बापू ज़मीदार चलता रहता है कोई हरयाणवी लगा ले चिल्ल सा कूल सा.
मटरू: अच्छा तो ले ये सुन ( हलवे हलवे चाल कदे रे तेरे ...... )

आप चाहे कोई भी शहर कोई भी राज्य के हो लेकिन आम तौर पर देखा जाता है की हम यदि अपने लोकल गाने सुनते है या गाते है तो हमे गवार समझा जाता है. यही कारण था कि काफ़ी बार हम हरयाणवी गाने एकांत में सुनकर ही एन्जॉय करते.

मटरू: टोकरे जा य़ार पानी की बोतल भर ला भाई.
टोकरा: भाई कल भी में लाया था आज भी में लाऊ.. ना ना कोई चक्कर ना आज सोनी लाएगा पानी.
मैं: मटरू भाई नी है ले आ य़ार प्लीज
मटरू: सालों कोई भी काम ना करते तुम (और मटरू गुस्से में बोतल उठा कर पानी भरने चला गया.)

ओये मोटे दरवाज़ा ढाल जइयो.... पीछे से आवाज़ आई

और मटरू जान बूझ कर दरवाज़ा पूरा खोल गया.

कुछ ही क्षण बीते थे मैं और टोकरा आराम से म्यूजिक एन्जॉय कर रहे.

तभी सामने से कंप्यूटर ब्रांच की दो कन्यायें हमारी ओर आने लगी.
मैं: ओये टोकरे जल्दी गाना बंद कर ( मैंने दबे स्वर में चिल्लाते हुए टोकरे से कहा )
टोकरा: अरे पासवर्ड क्या है ???

वो कन्यायें तेजी से हमारी ओर अग्रसर थी.

मैं: अरे जल्दी कर य़ार क्यों इज्ज़त डूबाने पर तुला है.
टोकरा: अरे मटरू का फ़ोन है मुझे क्या पता पासवर्ड कैसे बंद होगा !!
मैं: अरे यार ये मटरू भी.....सारे बटन दबा दे.... नहीं तो स्पीकर दबा दे आवाज़ बहार नहीं आनी चाहिए.

तब तक वे कन्यायें हमारे समक्ष खड़ी और एक ने कहा 
“छि इतने घटिया गाने कौन सुनता है ??..... अच्छा आज कंप्यूटर वालो का सेमीनार है और इलेक्ट्रॉनिक्स वालो को भी बुलाया है अपनी ब्रांच वालो को भी बता देना".

और ये बोल कर वे दोनों वहा से निकल ली

तभी मटरू पानी की बोतल हाथ में लिए ( हलवे हलवे चाल ....”) गाना गुनगुनाते हुए फ़िल्मी स्टाइल मे अंदर आया और कहता “ क्या बोल गई वे कंप्यूटर वाली” ??

टोकरा: तू यंहा आ मैं बताता हूँ क्या बोल गयी...!! (ग़ुस्से से )

आज कुछ सालों बाद जब ये गाना सुना तो वो सारा किस्सा दिमाग में फिर से ताज़ा हो गया.... आँखे खोलीं.....गाना रिवाइंड किया....आँखे बंद....और चेहरें पर मुस्कान लिए ....एक बार फिर वो क़िस्सा याद करने मे लग गए.

कोई कुछ भी सोचे-कहे मुझे हरयाणवी संगीत सुनना अंत पसंद है और ये “हलवे हलवे चाल कदे रे ...” वास्तव में रागनी है जो रीमिक्स के बाद एक आधुनिक गीत सी बन गयी है.

और एक ज्ञान की बात अपनी लोकल भाषा बोलने और सुनने से कोई गवार नहीं होता.



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