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नाम प्रदीप सोनी और घर वाले प्यार से ‘गोलू’ बुलाते हैयार दोस्तों ‘सोनी–मोनी–टोनी’ या जो नाम हत्थे चढ़ जाये वही. हरियाणा के शहर रेवाड़ी में अपना घर पाया जाता है. परिवार में 4 लोग है. फादर साहब का अपना बिज़नस है. माता जी गृह मंत्रालय संभालती है. और छोटा भाई अभी कॉलेज जाता है. जिंदगी की सबसे जबरदस्त बात ये रही की भगवान ने एक नंबर के माँ–बाप दिए जिनका आशीर्वाद, प्यार  और भरोसा हमेशा मिलता रहा है. बाकी रही बात भाई की तो भाई तो क्या है दोस्त है अपना एक नंबर का लड़का है. 
Still from 25th Marriage anniversary of Maa-Bapu ji

अपने नाना जी और मामा जी ने काफी ऐसे अनुभव उपलब्ध कराये जो शायद कभी खुद के दम पर करना आसान नहीं होता. अब चाहे वो तीन सितारा होटल का खाना हो या फिर सीमा से सटे पठानकोट के आलिशान होटल से सर्द सुबह को भारतीय वायुसेना के विमान को हिमालय की पहाड़ियों में लुप्त होता देखना. इसकी चर्चा भी की जायगी ब्लॉग में.


अब आप सब सोच रहे होंगे की आखिर मैं चाहता क्या हूँ “ तो सोचते रहो मुझे क्या “ चलो बता देत है भाई. बात ये है की बचपन से शर्मीला होने के कारण काफी ऐसी चीज़े रही जो मैं करना चाहता था पर शर्म की वजह से कभी की नहीं जैसे स्कूल में होने वाले कार्येक्रम में भाग लेना, नाचना, गाना, नाटक या फिर आर्ट एंड क्राफ्ट कुछ भी. मतलब लड़का एक दम लुल रह गया. कॉलेज पास आउट होने के टाइम आते आते लगने लगा की किसी हद तक जिंदगी का सबसे ‘स्वाद’ टाइम ‘बेस्वाद’ ही निकल गया है और पढाई में भी ऐसा नहीं की कुछ लठ गाडे हो. वो ही गिर पड़ के चालीस नंबर. उन दिनों मुझे अपने लक्षण बिल्कुल ठीक नहीं लगे और लगने लगा की बाबा हम से ना तो कुछ हो पाया है ना कुछ हो पाएगा. तब मुझे एहसास हुआ की नहीं मैं अपनी जिंदगी ऐसे ही खराब नहीं कर सकता. मैं इसे ढंग से खराब करूँगा. बस फिर अब कोशिश रहती है हँसते-खेलते रहने.



जिंदगी को ज्यादा सीर्येस लेने की जरुरत नहीं
यहाँ से कोई बच के जाने वाला नहीं.

जब भी ये लाइनें सोचता हूँ तो मिजाज में थोड़ी बेपरवाही आ जाती है. और सब मुझे दोस्त और दुनिया मोह माया लगने लगती है. और नीली छत्री वाला भी ऐसे लोगो को ही मिलाता है जो अच्छे इंसान होते है

इस ब्लॉग के माध्यम से मेरी कोशिश रहेगी की आप सब के साथ ऐसे किस्से – कहानियाँ साझा किये जाए जो रोज मर्रा की जिंदगी में कहीं ना कंही अपने लौंडे लोगो के साथ होते रहते है. जो कभी मुस्कान, तो कभी दर्द, कभी ज्ञान और तो कभी आशा लिए हो .... बस अब लग रहा है ये थोड़ी ज्यादा हो रही है. खैर ये ब्लॉग का कारण है की बचपन से मेरा सपना सा था की कोई खुद की ऐसी दुकान (वेबसाइट) होनी चाहिये जंहा भर भर के *यापा किया जा सके. तो बस हो गई ये वेबसाइट पैदा. हाँ एक और बात है की ज्यादातर पोस्ट हिंदी में होंगी क्योकि भईया इंतनी किसी में हिम्मत नहीं की मेरी अंग्रेजी झेल जाये. बाकी ब्लॉग पर मेरी कोई बात बुरी लागे तो आप बता सकते है. मेरी भी पूरी कोशिश रहेगी की किसी की भावनाएं आहत नहीं की जाए. उम्मीद है की लोग इसे पसंद करेंगे और ना भी करे तो कौन सा मेरी बकरी खोल लेंगे.




" शुक्रिया - जय हिन्द "

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अलविदा अम्मा

कल रात से ही माहौल गरमाया हुआ था और लोग हॉस्पिटल के सामने, सडको पर और जंहा जगह मिल जाये वंही भगवान को मानाने में लगे हुए थे. पर इस बार ऐसा लग रहा था की भगवान नहीं मानेंगे मगर लोग तो बिचारे भोले भाले होते है.
आज सुबहे 5 बजे अलार्म बजा तो देखा की टीवी चल रहा है और साथ वाले पलंग पर लेटे लातिश भाई बोले “ AMMA NO MORE YAAR”. मुझे लगा की लातिश भाई भी अम्मा के हार्डकोर फैन है. वैसे भी अपन को या कहे की सभी को पहले से ही आईडिया हो गया था की ज्यादा टाइम है नहीं अम्मा के पास. आज सारा दिन चर्चा का मुद्दा रही अम्मा टीवी, लोग, सड़क जहा देखो अम्मा ही अम्मा हो रही थी. मुझे तमिल नाडू का राजनीती तंत्र अजीब या कहे व्यक्ति केन्द्रित लगता है यहाँ के लोग राजनेताओ को भगवान का दर्जा देते है. नेताओ द्वारा अम्मा के पैर छूने की बात तो जग जाहिर है. कहा जाता है की शादी के टाइम लोग जयललिता जी की बड़ी सी मूर्ति आशीर्वाद देते हुए लगते है जिसमे हाथो से अम्मा फूल बरसाती है. मतलब अम्मा को भगवान का दर्जा है.


कुछ लोगो के साथ हुई बाते आप लोगो से साझा करता हूँ ये लोग तमिल नाडू के निवासी या वंहा से तालुक रखते है: 
अम्मा ने गरीबो …

Life @ MRK

इस पोस्ट का मकसद किसी भी तरह से कॉलेज की प्रशंसा या बुराई करना नहीं है. ये पूर्ण रूप से व्यक्तिगत विचार है अगर ये विचार किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु के विचारों से मेल खाते है तो उसे महज संयोग और मेरा दोस्त कहा जायगा.
हरियाणा के दक्षिण में बसे शहर रेवाड़ी से 7 किलोमीटर दूर खेतो के बीचो बीच उगे इस कॉलेज को “ MATA RAJ KAUR INSTITUTE OF ENGINEERING & TECHNOLOGY “ नाम से जाना जाता है.बनावट के हिसाब से ठीक ठाक ज़बरदस्त, स्टाफ के हिसाब से भी कुल मिला के बढ़िया. सुविधाओं के लिहाज से अच्छा कहा जा सकता है. खेतो के बीच में बसे होने के कारण लडको को कॉलेज से फरार होकर पिक्चर देखने जाने में काफी परेशानी उठानी पड़ती है. कभी कभी तो कॉलेज से भागे लड़के ऑटो ना मिलने की वजह से वापिस कॉलेज ही आ जाते है. कॉलेज की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा हरयाणा के बहार के लौंडो का भी होता है. जो थोड़े दिन में हरयाणवी बोलते देखे जा सकते है. अब काफी लोगों के मन में सवाल आया होगा की लड़कियाँ कैसी है भाई तो अपना जवाब है जैसा देखने वाला देखे. बाकि अपन को तो कोई खास लगी नहीं.


अब सब सोच रहे होंगे के ये सब क्यों बताया जा रहा है तो लिजीये …

A PHOTOGRAPHIC VISIT TO HARYANVI CULTURE

शहीद

शहीद PDF 



वो रोज धमाके सुनते है
जीते हैं जंग के साये में
वो खडे हुए हैं सीमा पर
ले असला अपनी बाहों में

गोलियों की बरसात में
वो लाल लहू से नहाते हैं
होली हो या दिवाली हो
सब सीमा पर ही मनाते हैं

इक आस जो घर पर जाने की
जो पल भर में धुल जाती है
सीमा पार से आकर गोली
साथी को डंस जाती है

फिर कहते हैं इस हालत में
हम घर को जा सकते नहीं
सर कटा सकते हैं लेकिन
सर झुका सकते नहीं
फिर खून खौल सा जाता है
रह रह कर गुस्सा आता है
वो घुंट लहू का पीते हैं
मर मर कर फिर भी जीते हैं

इस वतन चमन के खातिर
अपनी जान देश पर वार गए
खाकर गोली सीने पर वो
सीधे स्वर्ग सीधार गए

सजा तिरंगे में अर्थी‎ जब
घर पर लाई जाती है
याद करा कर कुर्बानी
गोलियां चलाई जाती हैं

सरकारी दलाल भी आते हैं
शहादत गिनाई जाती है
लाख रुपे का चैक दिखा कर
फोटो खिचवाई जाती है

बस इतना सा ये किस्सा है
बस इतनी सी ये कहानी है
ना इनका कोई बुढ़ापा है

सलाम ना आया

सलाम ना आया (PDF)




थी गुफ़्तगू इक आने के उसकी ढल चला आफताब पर पैगाम ना आया
चढ़ा था सुरूर मय खाने में थे हम पर सदियों से प्यासों का वो “जाम” ना आया
खड़े थे कुचे में इक झलक ऐ दीदार को वो आये नज़र मिली पर सलाम ना आया
मिली बदनामिया और मिली शौहरते पर हसरतों वाला दिली मुकाम ना आया
उसका था शहर और उसकी अदालते हम हुए हलाक उसे इल्जाम ना आया
“दीप” हुआ बदनाम सारे इस जंहा में  पर उस बेवफा का कही नाम ना आया
प्रदीप सोनी 

IAS सोनू

रात का वक्त हो चला है. डिम रोशनी में जलते उसबल्ब को देखता सोनू भयंकर सोच में है. अब शायद रिश्ता साजुड़ चला है उस जीरोवाट केबल्ब के साथ. ना जाने कितनी ही रात उसने उस बल्ब के साथ बातें की हैं.



आज शुरू होते ही खत्म हो जाने वाले इस कमरे में पूरे 2 साल हो चुके हैं. 2 साल हो चले हैं एक उम्मीद को पालते हुए. और हो चले हैं 2 साल इक सपने को जीते जीते.आज बात हो रही हैबल्ब सेकि किस कदर बीते हैं 2 साल.अब भी याद है जब वहउम्मीदों की पोटलीलिए दिल्ली आया था. चेहरे पर लाली और जुल्फें एकदम तेरे नाम के राधे भैया जैसी. पर अब 2 साल बाद राधे भईया वाली जुल्फे मनीष सिसोदिया के बालों में बदल चुकी हैं. 2 साल पहले वाला बाका सोनू हिंदी फिल्मो वाला लाला बन चुका है.पेट आ गयाहै सोनू को.
घर से आती उम्मीदों वाले फोन पर जब पूछा जाता कि बेटा पढ़ाई कैसे चल रही है. तो एक क्षण को सोचकर सोनू बोलता पढ़ाई तो अच्छी चल रही है माँ पर टाइम का नहीं मालूम कैसा चल रहा है.
जब छोटी बहन बोलती है कि " भैया इस राखी पर मुझे आप की लाल बत्ती वाली गाड़ी चाहिए ". फिर भी सोनू खामोशी से दबी आवाज़ में “हां” कर देता है.

पिता जी से अक्सर बात…

मेरे गुरु है नमन तुम्हे

दूर तलक था अँधियारा
जब जीवन का आगाज हुआ

अनजाना सफ़र अनजानी डगर
मकसद जीवन का राज हुआ

जो मिले आप तो मिला साथ
किसी धुन का जैसे साज हुआ

इस ज्ञान डगर पर चलने से
मुझे जीने का अंदाज हुआ

बन दीप गुरु जब आप जले
तो रोशन ये संसार हुआ

हे मेरे गुरु है नमन तुम्हें
मेरा धन्य जीवन आज हुआ


प्रदीप सोनी

पेपर और धक्के

सर्दियों ने भी जुल्म किया हुआ है कम्बखत दिन निकल कर कब रात हो जाती है अँधेरे अँधेरे में कुछ पता ही नहीं लगता ऊपर से पेपर की चिंता अलग. बिलकुल ऐसा लगता है जैसे बर्फ की सिल्ली पर लेटकर बेल्ट मारी जा रही हो. वो तो सभी को पता ही है कहा मारी जाती है. यार कल सुबह पेपर है और पढ़ा भी कुछ नहीं और उससे भी बड़ी टेंशन कल पेपर के टाइम तक कॉलेज पहुंचेगे भी या किसी मोड़ पे खड़े होकर लिफ्ट मांगते घूमेंगे. कोहरे की वजह से बस लेट हो जाये, आँख ना खुला और सौ बात. इन्ही खयालो ने ही मुझे और टीटू को 10 मिनट के अन्दर बस स्टैंड पंहुचा दिया. मैं और टीटू हाथ में झोला लिए बस स्टैंड पे झज्जर वाली बस के सामनेखड़े थे. तो भाई मौसम बड़ा ही सुहाना सा था एकदम आसमान काली घटाओ से घिरा हुआ मंद मंद सर्दी. बोले तो सेक्सी मौसम. हिंदी फिल्मो में जिसे बेईमान मौसम कहा जाता है. “ सीटी बजी “ "चलो भाई सारे बैठ लो चल पड़ी बस." अब भईया अपनी बसों में ये रुल था की अगर बस के अन्दर बैठ के गए तो 25 रुपे किराया और छत पर बैठ कर गए तो 15 रुपे किराया. तब मैंने और टीटू ने दिमाग लगाया की छत पर ही चलते है यार 10 – 10 रुपे बचेंगे उतर के समोसे ख…

भारतीय माँ के हथियार

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