आत्म गिलानी




कभी कभी हम लोगो से जाने अनजाने में कोई ना कोई ऐसी हरकत हो जाती की जिस पर हम खुद से ही खफा हो बैठते है ऐसा ही एक वाक्या अपने साथ भी हुआ जब तकनिकी ट्रेनिंग के लिए हम लोगो को कंपनी की तरफ से अमृतसर ले जाया गया.

हमारी ट्रेनिंग अमृतसर एयरफोर्स स्टेशन पर तकरीबन 10 दिन चलनी थी और मेरे लिए ये समय काफी मनोरंजन और काफी कुछ सीखने समझने वाला होना था.

एयरफोर्स स्टेशन का कैंपस काफ़ी बड़ा था और यदि हमे कुछ खाने पीने बाहर जाना हो तो उसी मे आधा घंटा लग जाता जिसकी वजह से हमे समय का काफी नुकसान हो जाता. तब एयरफोर्स के ही एक जनाब ने हमे बताया की पीछे वाले ब्लाक में एक माता जी कैंटीन में चाय पानी बनाती है अगर आप लोग उनसे बात करो तो वो आपका खाना भी बना देंगी.

उन एयरफोर्स वाले साहब ने हमे कैंटीन वाली माता जी से मिलाया. उम्र तकरीबन 65 के आस पास और उनके चेहरे पर संघर्ष की झुरिया साफ़ दिखाई पड़ती थी हमारे खाने वाली बात पर उन्होंने कहा की ठीक है मैं कल से आप 3 लोगो का खाना बना दूंगी.

हमने पूछा: माता जी पैसे कितने क्या होंगे.
माता जी: अरे बेटा जो तुम दो ठीक है.

उसके अगले दिन से हम लोग सुबह-दोपहर का खाना कैंटीन में खाने के लिए जाने लगे. माता जी के हाथ का खाना एकदम घर के बने खाने जैसा था जब वो सुबहे आती तो थैली में एक दो सब्जिया और आटा चावल ले आती और हमे बना कर परोस देती. और हमे खिलाने पर उनके चेहरे पर काफ़ी संतुष्टी का भाव रहता जैसे माँ अपने बच्चों को खिलाती है.

हम भी 3 लोगो के 200 रुपे देते और माता जी भी ख़ुशी ख़ुशी रख लेती और ट्रेनिंग के वो दिन बोहोत अच्छे जा रहे थे.

मगर एक दोपहर हमने खाना खाया. खाना रोज की तरह बढ़िया और घर जैसा था फिर मैं पैसे देने माता जी के पास गया और ना जाने मेरी क्या बुद्धि भ्रष्ट हुई.

मैंने जाकर माता जी को कहा की “माता जी आप तो बहुत महंगा खाना देती हो इतना महंगा तो बाजार में भी नहीं मिलता“

ये सुन कर माता जी को शायद ठेस लगी और उनके चेहरे के भी भाव उड़ गए
उन्होंने कहा "बेटा 60 रुपे के सब्जी, चावल, आटा लाती हूँ बाकि तुम्हे जो ठीक लगे वो दे दो."

उस समय मैं कुछ क्षण के लिए पूरा ब्लेंक हो गया मुझे नहीं पता मैंने वो क्या बोला, क्यों बोला, कैसे बोला या मुझ से ये बात कौन बुलवा गया.

और फिर मैं माता जी को 200 रुपे देकर वहा से चला गया.

माता जी का खाना बेहतरीन था और क़ीमत एकदम जायज जो हम ख़ुद ही अपनी इच्छा से देते थे. मगर ना जाने उस दिन क्या हुआ की मेरे मुंह से ये बात निकल गयी. फिर शाम को में सोचने लगा की कल जाते ही माता जी से माफ़ी मांगूंगा यार. मैं भी क्या ही बडबडा गया. मगर कुदरती ऊपर से आर्डर आ गए की आज शाम को ही दिल्ली लौट आओ.

कसम से ये वाक्या आज भी जब यादो में दौड़ता है तो टीस आज भी उठती है की यार मैं वो क्या बोल गया था. आज भी सोचता हूँ की वो माता जी कैसी होंगी. होंगी भी या नहीं. दोस्तों जिंदगी में अगर जाने अनजाने आपसे भी किसी का दिल दुःख जाये तो तुरंत माफ़ी मांग लो. भारी दिल लेकर घूमना बड़ा दुसवार होता है.



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