झरोखा भाग - 2

झरोखा एक फोटो-कैप्शन सीरीज है जिसमे सभी फोटो और कैप्शन लेखक की रचना है जिसमे किसी प्रकार की कोई मिलावट नहीं है 

सफ़र का क्या जनाब दिन चढ़ता है दिन ढ़लता है और समय का पहिया चलता है 

क्या ही मांगे अब ओर भला जिन्दगी में जो भी मिला है ज्यादा ही मिला है 

रौशनी भी कभी कभी इंसान को अँधा कर देती है 

सब इस पार उस पार का खेल है दोस्त इस पार रह गए उस पार निकल गए 

भूत से जीतने का एक ही तरीका है की खुद को इतना तेज़ भागो की अतीत पीछे छूट जाये 

मकान तो लोगो के होते है जनाब मुसाफिरों के तो तम्बू हुआ करते है तम्बू 

 घमंड एक एहसास है सब करते है मगर खंडरो से हवेली की दास्ताँ ना पूछना

रोटी के लिए वो सपने बेच देता है पापी है पेट ये अपने बेच देता है 

शाम का वक़्त हो शुक्रवार का दिन और भला क्या ही होता तस्सली का नाम 

दिख ही जाती है दोस्त चिराग़ की लौ रौशनी कभी अँधेरे से सौदे नहीं करती 

सुख - दुःख तो अटल है और अमर तो अटल भी नहीं 

कमाई हो या पढाई त्याग मांगे मेरे भाई 

क़ीमत वही दोस्त जो चुकाई ना जा सके वरना मोल तो यहाँ भरे बाजार लगता है 

जीवन का बस ये किस्सा है कोई चढ़ता सूरज है कोई ढ़लता सूरज है 

मंजिले तो अक्सर करीब होती है दोस्त मगर नज़रों का चश्मा साफ़ नहीं होता 

ऐसे ही सौदे ना किया करो भरे बाजार यहाँ जीवन बेच के कोई अपना मोल लगता है 

किस्मत पर ताले तो नहीं होते दीप मगर बंधी बंधी सी किस्मत फिर भी ना जाने क्यों लगती है 

उम्मीद के सवेरा रोज होता है हालत बदलने की हिम्मत जुटाओ तो यारो 

मुक्कमल हो जाये जीवन का सफ़र कभी रहमतों की बारिश दिखा तो मौला 

तस्वीर वही है दीप यहाँ जो दिल आँखों में बस्ती है 

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